थोड़े से, क्षणिक सांसारिक सुख के बदले में अनंत/शास्वत आत्मिक सुख को छोड़े/भूले हुये हैं ।
ऐसा ही है जैसे मंज़िल के रास्ते में थोड़ी सी पेड़ की छांव के लिये मंज़िल पहुँचने का इरादा भूल गये हैं ।
चिल्लर के चक्कर में खजाना छोड़ रहे हैं ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है ।
जैसी संगति वैसे बनोगे ।
मंदिर जाओगे भगवान जैसे, गुरूओं की सेवा में रहोगे त्याग/संयम के भाव बनेंगे ।

मुनि श्री विश्रुतसागर जी

शुद्ध घी तो घर का ही होता है, निकालना भी आता है, पर प्रमाद और समयाभाव से बाज़ार से लेते हैं ।
गुरू महनत करके ज्ञान रूपी घी हमें देते हैं ।
पर ध्यान रहे ऐसे गुरू से मत लेना जो नकली देता हो या खुद प्रमादी हो ।

चिंतन

हमें समतल होना होगा (कमजोरियों के गड़्ड़े भरने होंगे, घमंड़ के टीले ढ़हाने होंगे) तभी समता भाव आयेगा – प्रिय/अप्रिय से, सुख दु:ख में स्थिरता रहेगी ।

ब्र. नीलेश भैया

सेठ हुकुमचंद्र जी के सात मिल थे, आठवें मिल खोलने से पहले उन्होनें अपनी पत्नी से सलाह ली ।
पत्नि – सात मिल सात नरक के कारण हो गये, अब आठवाँ खोल कर कहाँ जाओगे ?

ब्र. नीलेश भैया

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