कंजूस अपनी बचत तो करता है, दूसरों के खर्च कराता है ।
मितव्ययी जरूरत पड़ने पर सामर्थ के अंदर कितना भी खर्च करता है, पर दूसरों की फिजूलखर्ची भी रोकता है ।

चिंतन

जिसमें याद ना आए वो तन्हाई किस काम की,
बिगड़े रिश्ते ना बने तो खुदाई किस काम की ?
बेशक इंसान को ऊँचाई तक जाना है,
पर जहाँ से अपने ना दिखें वो ऊँचाई किस काम की ?

(श्री संजय)

ख्वाहिशों से नहीं गिरते हैं फूल झोली में,
कर्म की शाख को हिलाना होगा ।
कुछ नहीं होगा कोसने से अंधेरे को,
अपने हिस्से का दिया खुद ही जलाना होगा ।

(श्री अरविंद)

‘प’ शब्द हमको बहुत प्रिय है ।
हम जिंदगी भर ‘प’ के पीछे भागते रहते हैं ।
जो मिलता है वह भी ‘प’ और
जो नहीं मिलता वह भी ‘प’ ।
पति- पत्नी- पुत्र -पुत्री -परिवार-
पैसा -पद-प्रतिष्ठा-प्रसंशा ।

‘प’ के पीछे पड़ते-पड़ते हम पाप करते हैं ,यह भी ‘प’ है ।

फिर हमारा ‘प’ से पतन होता है और
अंत मे बचता है सिर्फ ‘प’ से पछतावा ।

पाप के ‘प’ के पीछे पड़ने से अच्छा है
परमात्मा के ‘प’ के पीछे पड़ें..।

(श्री संजय)

पं. श्री रतनलाल मुख्तार जी ने परिग्रह की सीमा का नियम लिया ।
मंहगाई बढ़ती गयी, उन्होंने एक बार खाना शुरू कर दिया, और बढ़ी तो वे आधी धोती पहनने लगे ।
परिस्थितियों के साथ नियम नहीं बदलने चाहिये, बल्कि अपने आपको बदलें ।

पाठशाला

हनुमान और रावण में प्रतिस्पर्धा हो गयी ।
रावण ने पहले घूँसा मारा हनुमान सहजता से झेल गये ।
हनुमान ने मारा तो रावण बेहोश हो गया ।
हनुमान दु:खी ।
कारण ?
रावण बचा कैसे ?
मेरी साधना का फायदा क्या हुआ !!

ज्ञान की साधना करते रहें और वह ज्ञान हमारा संसार समाप्त न कर पाये/संसार से वैराग्य उत्पन ना कर पाये, उस ज्ञान का क्या फायदा !!!

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

March 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031