जब अकेला होना ही है, तो उसे स्वीकारते क्यों नहीं ?
अलगाव को भी अपने जीवन के किसी कोने में जगह दो, और अलगाव हो जाने पर शांति से उस कोने में बैठ जाओ ।

ब्र. नीलेश भैया

पहली बार एक महिला माँ बनने वाली थी ।
उसने अपनी सास से कहा – मैं सोने जा रही हूँ, जब बच्चा हो जाये तो म्य्झे जगा देना ।
सास – तुझे मैं जगाऊँगी या तू पूरी दुनियाँ को जगायेगी !!

(श्री बी. के. जैसवाल)

जिसको अनुभूति हो जाती है, उसे तथा दुनियाँ को स्वत: पता लग जाता है, बताने की जरूरत नहीं होती है ।

चिड़ियाऐं इतने सुंदर सुंदर घोंसले बना लेतीं हैं ।
अपने बच्चों को घोंसला बनाना कैसे सिखातीं हैं ?

वचनों से नहीं अपने आचरण से ।
हम अपने बच्चों को भाषणबाजी से ही सिखाना चाहते हैं, बिना आचरण देखे वे कैसे सीखेंगे ?

चिंतन

Pencil: I’m sorry.

Eraser: For what? You didn’t do anything wrong.

Pencil: I’m sorry, you get hurt because of me. Whenever I made a mistake, you’re always there to erase it. But as you make my mistakes vanish, you lose a part of yourself and get smaller and smaller each time.

Eraser: That’s true, but I don’t really mind. You see, I was made to do this, I was made to help you whenever you do something wrong, even though one day I know I’ll be gone. I’m actually happy with my job. So please, stop worrying I hate seeing you sad.

“Our Parents are like the eraser, whereas we children are the pencil. They’re always there for their children, cleaning up their mistakes.
Sometimes along the way they get hurt and become smaller (older and eventually pass on)

Take care of your Parents, treat them with kindness and most especially love them

(Ms. Neelam – Delhi)

संसारिक संकल्प जो करते हैं उनके विकल्प बहुत होते हैं ।
झूठ बोलने वालों के भी बहुत विकल्प होते हैं ।
संसारिक संकल्प तो झूठे ही होते हैं, इसलिये झूठ की तरह विकल्प भी बहुत/अशांति भी बहुत ।

चिंतन

शिष्य ने गुरू को सोने का पात्र दिया, उन्होंने उसके बदले मिट्टी का पात्र वापस कर दिया ।
उसने बाहर आकर देखा कि उसका घोड़ा गायब है और उसकी जगह गधा बंधा है ।

गुरू इशारा कर रहे थे – सोने सी मनुष्य पर्याय क्यों मिट्टी कर रहे हो तथा तीर्थ करने वाले हे घोड़े !!
क्यों गधे जैसे बन रहे हो ।

मुनि श्री मंगलानंद जी

किसी कम्पनी का मालिक आपको किसी बड़े इनाम की घोषणा करता है या आपकी पदोन्नती करता है तो उसका आदेश तो मालिक खुद नहीं निकालता बल्कि अपने किसी सेवक से दिलवाता है ।
तो हम मालिक का अहसान मानते हैं या उस सेवक का ?

ऐसे ही भगवान का अहसान मानें/उनको दिन रात याद करें/उनकी पूजा करें, उनके सेवकों की नहीं ।

चिंतन

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