दोस्त – दो का अस्तित्व जब एक लगने लगे ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

लोग मंज़िल को मुश्किल समझते हैं,
हम मुश्किल को मंज़िल समझते हैं |
बडा फ़र्क है लोगों में और हम मैं,
लोग ज़िंदगी को दोस्त और हम दोस्त को ज़िंदगी समझते हैं ||
आदतें अलग हैं हमारी दुनियाँ वालों से,
कम दोस्त रखते हैं मगर लाज़वाब रखते हैं |
क्योंकि बेशक हमारी माला छोटी है,
पर फूल उसमे सारे गुलाब रखते हैं ||

अज्ञान दशा में जोड़ा है (जरूरत से ज्यादा) तो ज्ञान दशा में छोड़ दो ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

किसकी बात मानें ?
मन की ?
मन तो मोह में मदहोश रहता है !!

दूसरों की ?
वे भी रागीद्वेषी हैं, सही सलाह कैसे देंगे !!

सच्चे देव, गुरू. शास्त्र की मानो,
उन्हें सुनकर, समझकर अपने विवेक की मानो ।

चिंतन

यदि मंदिर सिर्फ मंदिर जाने के लिये जा रहे हो तो याद रखना उस मंदिर के चूहे आदि बनोगे ।
यदि अपने अंदर जाने के लिये जा रहे हो तो मंदिर के अंदर बैठे भगवान बनोगे ।

आचार्य श्री विशुद्धसागर जी

आँखों में कचरा गिरते समय, पलकें कचरे से आँखों को बचाने का पूरा प्रयास करतीं हैं, चाहे कचरा गिरे या आँखें बचें ।
दांतों में कुछ फंसने पर जीभ उसे निकालने का लगातार प्रयास करती रहती है चाहे डॉक्टर भी तिनका निकालने में लगा हो ।

श्री लालमणी भाई

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