“मौत को तो मैंने कभी देखा नहीं,
पर वो यकीनन बहुत खूबसूरत होगी ।
कमबख्त जो भी उससे मिलता है,
जिंदगी जीना ही छोड़ देता है” ।।

शुद्ध घी तो घर का ही होता है, निकालना भी आता है, पर प्रमाद और समयाभाव से बाज़ार से लेते हैं ।
गुरू महनत करके ज्ञान रूपी घी हमें देते हैं ।
पर ध्यान रहे ऐसे गुरू से मत लेना जो नकली देता हो या खुद प्रमादी हो ।

चिंतन

हमें समतल होना होगा (कमजोरियों के गड़्ड़े भरने होंगे, घमंड़ के टीले ढ़हाने होंगे) तभी समता भाव आयेगा – प्रिय/अप्रिय से, सुख दु:ख में स्थिरता रहेगी ।

ब्र. नीलेश भैया

सेठ हुकुमचंद्र जी के सात मिल थे, आठवें मिल खोलने से पहले उन्होनें अपनी पत्नी से सलाह ली ।
पत्नि – सात मिल सात नरक के कारण हो गये, अब आठवाँ खोल कर कहाँ जाओगे ?

ब्र. नीलेश भैया

प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी ने अपनी मुनि अवस्था में 1920 से 1955 तक 35 वर्षों में, आहार सिर्फ 9 वर्ष 6 माह ही किया ।
(यानि 9938 दिन उपवास किये- मुनि श्री प्रमाण सागर जी 20-8-20)

चारित्र चक्रवर्ती

रुकते तो मेले में हैं, संसार के मेले में गति कहाँ ?
इसीलिये कहा है – रुकना मृत्यु है, मुक्ति से दूर होना है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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