कुछ लोगों की सार्थकता दुनिया में खुश्बू की तरह रहती है, रोज महसूस तो होते हैं पर दिखाई नहीं देते हैं ।
(श्री अरविंद बड़जात्या)
हिटलर ने थोड़े समय ड़राया, सालों राज्य किया ।
हम भी यदि ग्रहों/रागी देवी देवताओं से ड़र गये तो ज़िंदगी भर वे हम पर राज्य करते रहेंगे,
हो सकता है जन्मजमांतरों तक ।
ब्र. नीलेश भैया
Winning doesn’t make you a better person;
But being a better person will make you winner.
(Mr. Deepak Jaiswal)
आचार्य श्री विद्यासागर जी को उनके गुरू आचार्य श्री ज्ञानसागर जी जब 22 साल की उम्र में दिगम्बर मुनि बना रहे थे तब समाज वाले उनके पास समझाने पहुँचे कि इतनी कम उम्र में दीक्षा न लें ।
आचार्य श्री – वैराग्य तो अंतरंग प्रक्रिया है जो हो चुकी है, अब तो बाह्य औपचारिकता रह गयीं हैं ।
गांधी जी एक गाल पर थप्पड़ खाने के बाद दूसरा गाल इसीलिये आगे कर देते थे, क्योंकि वे जानना चाहते थे कि मेरे पाप का उदय समाप्त हुआ या नहीं ।
मुनि श्री विनिश्चयसागर जी
Your “I can” is more important than your “IQ”.
(Dr. Amit)
बचपन की वो अमीरी ना जाने कहाँ खो गयी….?
वर्ना कभी, बारिश के पानी में हमारे भी जहाज चला करते थे ।
(श्री संजय)
तकदीर बदल जाती है जब ज़िंदगी का कोई मकसद हो,
वरना ज़िंदगी कट जाती है तकदीर को इल्ज़ाम देते देते ।
(श्री दीपक जैसवाल – ग्वालियर)
Entire water of the sea can’t sink a ship unless it gets inside the ship.
Similarly, negativity of the world can’t put you down unless you allow it to get inside you.
(Mr. Ravikant)
मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे
दीन-दु:खी जीवों पर मेरे उरसे करुणा स्रोत बहे,
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूँ
बने जहाँ तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ।
किसी का ये सोचकर साथ मत छोड़ना कि उसके पास कुछ नहीं है तुम्हें देने के लिये,
बस ये सोचकर साथ निभाना कि उसके पास कुछ नहीं तुम्हारे सिवा खोने के लिये ।
(श्री ब्रजेश)
Do not wait to strike till the iron is hot,
but make it hot by striking.
क्रोध को तीव्रता के अनुसार पत्थर,मिट्टी,रेत,पानी की लकीरों से तुलना की गयी है।
लकीरों से तुलना क्यों ?
क्योंकि क्रोध प्रियजनों के बीच दरार डाल देता है।
पत्थर की लकीर लम्बे समय तक भी नहीं भरती,
मिट्टी की बरसात में भर जाती है,
कम क्रोध की तुलना रेत तथा पानी में खिंची लकीरों से दी है।
सस्ते से सस्ते मिट्टी के बर्तन के टूटने पर हम दुःखी हो जाते हैं,
पर छोटी से छोटी बात पर हम अपना जीवन नष्ट करने में नहीं हिचकते ।
क्या हमने अपने जीवन को मिट्टी के बर्तन से भी सस्ता तो नहीं बना लिया ?
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