एक Non-Veg लेने वाले आध्यात्मिक प्रकृति के वकील ने कहा –
अहिंसा धर्म मानने वाले अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं । जिन मतों में अहिंसा का महत्त्व नहीं है या कम है, वे अपने मत को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं ।
फ़ैसला कैसे हो ?
फ़ैसला तो मरने के बाद ऊपर जाकर ही हो पायेगा ।
पर ये तय है कि अहिंसा मत मानने वाले वे गुनाह तो करते ही नहीं जिनकी दूसरों के मतों के शास्त्रों में मनाही है ।
लेकिन दूसरे मत वाले ऐसे गुनाह खूब करते हैं, जिनको अहिंसा मत में निषेध कहा है ।
यदि ऊपर जाकर दूसरे मत वाले सही सिद्ध हुये तब भी अहिंसा वाले तो Least Risk पर रहेंगे ।
लेकिन ख़ुदानाख़ास्ता अहिंसा धर्म सही निकल गया तो हमें क्या सज़ा मिलेगी इसका ज़िक्र हमारी धर्म पुस्तकों में भी नहीं मिलेगा । क्योंकि हमारी पुस्तकों में उन्हीं गुनाहों की सज़ा लिखी है जिनको उन्होंने गुनाह माना है ।
श्री आशीषमणी/श्री सौरभ जैन – नोयड़ा
श्रीमति राधाबाई* ने एक दिन बहुत अच्छी मालिश की । मैंने उसकी बहुत प्रशंसा कर दी, तो बाई नाराज़ हो गयी ।
कारण ?
बाई – तुमने मेरा भगवान मार दिया ।
कैसे ?
बाई – प्रशंसा सुनकर मन में अभिमान आता ही है,
और जिस मन में अभिमान होता है उसमें भगवान नहीं रहते ।
* तेल मालिश करने वाली बाई
शशि
If you can not find the brighter side of life then polish the darker side.
Attitude of adjustment is the only instrument to live a great life.
(Dr. S. M. Jain)
माल और मल में फ़र्क सिर्फ ‘आ’ का है,
चंदन हो, केसर, पुष्प या बादाम हो, कैसा भी माल हो, शरीर के नज़दीक आते ही मल बन जाता है ।
(श्रीमति रिंकी)
एक सवाल –
रिश्तों का क्या मतलब होता है ?
जहाँ मतलब हो वहाँ रिश्ता ही कहाँ होता है ?
(ड़ॉ सुधीर)
Someone asked a Philosopher – ‘How do you believe that God exists ?’
His smart answer was – ‘Absence of evidence is not the evidence of his absence…’
(Mr. Sanjay)
बालक अपनी अपार शक्ति से लक्ष्य भेदने के लिये, माता पिता रूपी कमान को झुकाते हैं/उन्हें Use करते हैं ।
श्री ख़लील ज़िब्रान
स्वर्ग और नरक में केवल दो रूपये का फ़र्क है ।
100 Rs. की आय हो और खर्चा 99 Rs. का तो स्वर्ग है,
100 Rs. की आय हो और खर्चा 101 Rs.का तो नरक है ।
श्री मनराय
Happiness is not something you postpone for the future.
It is something you design for the present.
Make each moment a happy one.
(Dr. Sudheer)
गृहस्थों के दो ही दुश्मन होते हैं – राग और द्वेष
साधुओं का एक ही दुश्मन होता है – राग
बाई जी
मिट्टी के जिस बर्तन में तुम स्वादिष्ट भोज्य लेकर हर्षित हो रहे हो, वह कुम्हार की भट्टी में तपकर आता है ।
बांसुरी पहले छेद कराने का शोक सह चुकी है ।
निर्विकल्प अवस्था में ही हर्ष/शोक रहित स्थिति रहती है ।
श्री ख़लील ज़िब्रान
You can not change your future…
But you can change your habits…
And surely your habits will change your future…
Sri. Marco Polo
यदि अपनी कमज़ोरियों पर विजय प्राप्त करलें तो दसों दिशायें हरी-भरी हो जायेंगी।
चिंतन
मन लगाने के लिये सामूहिक क्रियायें करें,
भक्ति अकेले में सबसे अच्छी होती है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
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