पेन की स्याही भाग्य है,
उसके द्वारा अच्छा/बुरा लिखा गया पुरूषार्थ है ।
चिंतन हमारी माँ…चिंतन
अनहोनी कभी होती नहीं,
होनी कभी रुकती नहीं ।
(श्री वी. के. जैसवाल)
All beautiful relationship does not depend on how well we understand someone..
But…
It depends on how well we manage the misunderstandings.
(Mr. Dharmendra)
बच्चों पर कामदेव भी असर नहीं करता ।
बच्चों जैसे निर्मल बन जायें तो विकार नहीं आयेंगे ।
आर्यिका सोहार्दमति जी
साधक तो प्रभावक होगा ही, पर प्रभावक बाधक भी हो सकता है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
When things go wrong, do you get better or bitter ?
(Mr. Sanjay)
ज़िंदगी में उन Boundaries के अलावा कोई Boundaries नहीं होती, जो हम खुद तय करते हैं ।
(श्री धर्मेंद्र)
लफ़्ज़ ही एक ऐसी चीज़ है, जिसकी वज़ह से या तो इंसान दिल में उतर जाता है, या दिल से उतर जाता है ।
अगर हमारे अल्फ़ाज़ों से कभी कोई दुखी हुआ हो तो उत्तम क्षमा ।
श्री संदीप, मनीषा, मिलि,
अरिहंत कहते हैं की सब जीवों को माफ करो, हृदय के कोने को साफ करो ।
माफी मांगने की शुरूआत मैं करता हूँ, माफी देने की शुरुआत आप करो ।
सुश्री पूनम
हमने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी बड़ी धूमधाम से पर्युषण महापर्व मनाया और उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य धर्मों को अपने जीवन में यथाशक्ति अंगीकार किया, क्यों न अगले 365 दिन भी हम यथाशक्ति 10 धर्मों के साथ जीवन जियें और इस तरह जीवन व्यतीत करते हुये जीवन के अंत समय में समाधिमरण पूर्वक इस नश्वर देह का त्याग करें ।
श्री संजय
- आत्म कल्याण के लिये पांचों इन्दियों के विषयों/पापों को छोड़ना उत्तम ब्रम्हचर्य है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी ब्रम्हचर्य के लिये इष्ट, गरिष्ठ, अनिष्ट आहार ना लेने की सावधानी बताते हैं ।
शारीरिक श्रंगार और कुसंगति इसमें बड़ा अवरोध है ।
- आत्मा में रमण करना उत्तम ब्रम्हचर्य है ।
रमण करना तो हमारा स्वभाव है पर स्वयं में रमण ब्रम्हचर्य और पर पदार्थों में अब्रम्ह है ।
- मन वाला तो ठीक पर मतवाला ठीक नहीं ।
- गृहस्थों के लिये एक पत्नी/एक पति संयम को ब्रम्हचर्याणुव्रत कहा है ।
- शील के बिना कोई धर्म का स्वाद ले ही नहीं सकता है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
- बाह्य और अंतरंग ममत्व का पूरी तरह से छूटना उत्तम आकिंचन्य है ।
- परिग्रह तो दुख ही है, क्योंकि इसमें रागद्वेष उत्पन्न होता है ।
- परिग्रह का भाव क्यों आता है ?
1. लोभ के कारण ।
2. दूसरों का वैभव देखने से ।
- वैभव कम होने से दीनता नहीं आती ?
नहीं, आनंद आता है ।
परिग्रह के साथ तो आनंद का भ्रम है क्योंकि इसमें तो आकुलता हमेशा बनी रहती है ।
- आकिंचन्य लाने के लिये क्या करें ?
1. न्याय पूर्वक अहिंसक व्यापार करें ।
2. कर्म फल में विश्वास रखें (जो कम ज़्यादा मिला है वो मेरे पूर्व कर्मों का फल है)।
3. अपने से छोटों को देखें और जो मिला है उसमें संतोष रखें ।
4. साधुजनों की संगति करें ।
5. अपने आत्म स्वरूप को पहचानें और चिंतन करें ।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी – पाठ्शाला (पारस चैनल)
- एक कंजूस आदमी का लड्डू जमीन पर गिर गया, उसने उठाकर थैली में डाल लिया ।
लोगों के टोकने पर उसने कहा घर जाकर इसे साफ़ करके फेंक दूंगा ।
हम पैसा कमाने का उद्देश्य भी कुछ ऐसे ही बताते हैं –
“हम तो ज्यादा इसलिये कमाते हैं ताकि ज्यादा दान दे सकें ।”
यानि पहले कीचड़ में लिप्त हो फिर सफ़ाई करो ।
रत्नत्रय- भाग-2
- स्व और पर कल्याण के लिये अपनी वस्तु का त्याग ।
- आदर्श त्याग – विषयभोगों का + अंतरंग और बाह्य परिग्रह का ।
- गृहस्थों का त्याग – विषय भोग, कषाय तथा परिग्रह कम करना
तथा चारों प्रकार के दान – आहार, ज्ञान, औषधि, अभय ।
- त्याग का फल कम ज्यादा निम्न कारणों से होता है ।
1. विधि – जैसे आहार विधि पूर्वक देना ।
2. द्रव्य – आहार पात्र, स्वास्थ्य, स्थान और मौसम की अनुकूलता के अनुसार हो ।
3. दाता – भक्ति पूर्वक, मन से दान दें ।
4. पात्र – I. सुपात्र – व्रती लोग II. कुपात्र – बाहर से व्रती पर भाव अच्छे नहीं III. अपात्र – अयोग्य ।
सुपात्र को दान देने से फल अधिक मिलता है ।
- दान/त्याग – त्याग पूरी वस्तु का किया जाता है और इसमें ग्रहण करने वाले की अपेक्षा नहीं होती है ।
दान में कुछ भाग ही दिया जाता है और पात्र की अपेक्षा से देते हैं । यह गॄहस्थों के ही होता है ।
- करुणादान – जैसे रक्तदान, मरण के पश्चात नेत्र दान, प्याऊ आदि लगवाना ।
इसमें पात्र की अपेक्षा नहीं रहती है ।
- कितना दान करें ?
1. उत्तम – आय का 1/4 भाग ।
2. मध्यम – आय का 1/6 भाग ।
3. जघन्य – आय का 1/10 भाग ।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी – पाठ्शाला (पारस चैनल)
- कम से कम उन चीज़ों का तो त्याग कर ही दें –
1. जो आपके लिये हानिकारक हैं ।
2. जिनका आप प्रयोग नहीं करते ।
3. जो आपसे कोई ले गया हो और लौटा नहीं रहा हो ।
बाई जी
- इच्छाओं का निरोध ही तप है ।
- दो तरह के लोग होते हैं –
1. खाने पीने और मस्त रहने वाले, ये दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।
2. साधना तप करने वाले जो इस जन्म में और अगले जन्म में भी सुगति प्राप्त करते हैं ।
- फिर हम तप क्यों नहीं कर पाते ?
1. हमें उसकी महिमा/फल पर विश्वास नहीं है ।
2. दूर से देखने पर हमें कष्ट मालूम पड़ता है ।
3. इच्छाशक्ति की कमी ।
- तप क्यों ?
1. कर्मों को जलाने के लिये ।
2. पुण्य बंध के लिये ।
3. पापों से बचने के लिये ।
4. समाधिमरण में सहायक होता है ।
5. मोक्ष प्राप्ति के लिये ।
- तप के भेद –
1. छ: बाह्य जो दिखाई देते हैं – उपवास आदि ।
2. छ: अंतरंग – प्रायश्चित्त आदि ।
- वैसे तो उत्तम तप साधूओं में होता है पर गृहस्थों को भी इसका आंशिक रूप से पालन करना चाहिए और धीरे धीरे इसको बढ़ाना चाहिए, जैसे नमक आदि छोड़ना, बाहर की चीजें छोड़ना, पर्वों पर एकासन/उपवास करना ( सामूहिक करने में आसानी हो जाती है ) ।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी – पाठ्शाला (पारस चैनल)
- Tap (नल) की तासीर है कि उसे प्रयोग (खोलना) करो तो टंकी खाली हो जाती है ।
“Tap” की हिन्दी “तप” की भी यही प्रकृति है ।
तप से भी कर्मों की टंकी खाली हो जाती है ।
चिंतन
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