श्रीमति राधाबाई* ने एक दिन बहुत अच्छी मालिश की । मैंने उसकी बहुत प्रशंसा कर दी, तो बाई नाराज़ हो गयी ।
कारण ?
बाई – तुमने मेरा भगवान मार दिया ।
कैसे ?
बाई – प्रशंसा सुनकर मन में अभिमान आता ही है,
और जिस मन में अभिमान होता है उसमें भगवान नहीं रहते ।

* तेल मालिश करने वाली बाई

शशि

मिट्टी के जिस बर्तन में तुम स्वादिष्ट भोज्य लेकर हर्षित हो रहे हो, वह कुम्हार की भट्टी में तपकर आता है ।
बांसुरी पहले छेद कराने का शोक सह चुकी है ।
निर्विकल्प अवस्था में ही हर्ष/शोक रहित स्थिति रहती है ।

श्री ख़लील ज़िब्रान

मन लगाने के लिये सामूहिक क्रियायें करें,
भक्ति अकेले में सबसे अच्छी होती है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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