ज्ञान / क्रिया…
श्री आर.के.जैन (कलेक्टर) से पूछा –> आपके पास सबसे ज्यादा शिकायत कौन सी आती हैं ?
पत्रकार.. “आप लोगों को समाज की परेशानियों का ज्ञान तो रहता है फिर भी आप उन पर कार्यवाही क्यों नहीं करते ?”
आर.के.जैन… क्या हम सबको अपनी-अपनी कमजोरी नहीं मालूम! फिर हम उनको दूर करने के लिए कुछ करते क्यों नहीं!!

ब्र.(डॉ.) नीलेश भैया

मिट्टी सुंदर, पानी भी सुंदर, आपस में संबंध स्थापित करते ही असुंदर कीचड़।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

(जब दो सुंदर वस्तुओं के संबंध का आउटपुट असुंदर होता है तो असुंदर के साथ संबंध का आउटपुट क्या होगा !)

धार्मिक –> जो धार्मिक क्रियाएँ करे।
धर्मात्मा –> जिसकी आत्मा में धर्म आ गया हो/ धर्म को आत्मसात कर लिया हो।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

दो प्रकार के मन मानो → एक शरीर का दूसरा आत्मा का।
शरीर का मन कहता है खाओ पीओ ऐश करो। आत्मा का मन कहता है व्रत उपवासादि करो।
जीतेगा कौन ?
यदि शरीर वाले को ज्यादा महत्व/ समय देंगे तो शरीर वाला अन्यथा आत्मा वाला।

आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी

पानी को भी पानी की प्यास होती है तभी तो नदी समुद्र की तरफ दौड़ती है।
यदि यह प्यास समर्पण के लिए हो तो फिर नदी को समुद्र बना देती है, बहुत बड़ा/ विशाल बना देती है। यदि समर्पण/ देने का भाव ना हो तो प्यास प्यास कह कर के दम तोड़ देते हैं। मृगमरीचिका वाली प्यास में भी जीव प्राण त्याग देता है, जहाँ पानी है ही नहीं उससे प्यास बुझाना चाहता है।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

“कौन बनेगा करोड़पति” टीवी प्रोग्राम में कठिन प्रश्नों के जबाब Elimination से आते हैं।
ऐसे ही आत्मा के बारे में जानना बहुत कठिन है सो Elimination से समझें –> आत्मा को स्पर्श नहीं किया जा सकता, उसमें न स्वाद है, न गंध, ना ही उसे देखा जा सकता है।

चिंतन

वैष्णव मतानुसार श्रीकृष्ण ने छोटा गोवर्धन उठाया, हनुमान ने तो हिमालय का बड़ा पर्वत खंड*, फिर प्रसिद्धि कृष्ण को ज़्यादा क्यों ?
कृष्ण ने बहुत सारे जीवों की रक्षा हेतु उठाया था। इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था।
हनुमान ने एक जीव की रक्षा के लिए। उन पर विकल्प भी था, खाली संजीवनी ले जा सकते थे।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

* (वह भी हाथ में उठा कर लेकर गए – डॉक्टर एस.एम. जैन)।

आँख आदि की दवा परिवार में कई लोग डालते हैं। अपनी-अपनी डिब्बी पर निशान बना लेते हैं।
कुछ दिनों में डिब्बियाँ खराब हो जाती हैं, पर हम उनको चलाते रहते हैं। क्योंकि अंदर की शीशियाँ सबकी एक सी पर महत्वपूर्ण होती हैं।
ऐसे ही आत्माएँ सबकी एक सी। शरीर रूपी डिब्बियाँ अलग-अलग ताकि पहचान सकें।

चिंतन

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