आग जले, धुंआ न उठे;
पानी बरसे , कीचड़ न हो;

कर्म करें मगर अहं से न भरें ।

आचार्य श्री पुष्पदंतसागर जी

तिरस्कार को यदि सही परपेक्ष में लिया जाए, तो वह प्रेरणाश्रोत बन जाता है ।
तुलसीदास जी की पत्नी का तिरस्कार ही उनकी महानता में निमित्त बना ।

श्री सुनील जैन- दिल्ली

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