शीश की सार्थकता तो गुरूजनों से आशीष लेने में ही है ।

आर्यिका श्री सौभाग्यमति माताजी

कुत्तों के पास से कार गुजरते ही वो उसके पीछे दौड़ने लगते हैं और भौंकते हैं ।
क्या सोचते होंगे वे कुत्ते ?
गाड़ी को रोक कर उसके मालिक बन जायेंगे ?
गाड़ी को चलायेंगे ?

नहीं वो तो सिर्फ पीछा करते हैं, ना कभी मालिक बनेंगे और ना वो गाड़ी कभी उन्हें सुख दे पायेगी ।

( Dr P. N. Jain)

सांसारिक सुख भी ऐसा ही है, पूरी दम लगा कर हम उसके पीछे दौड़ रहे हैं, ना वह कभी हमारे हाथ आयेगा और ना ही हम को सुख शांति दे पायेगा ।

स्वतंत्रता, विदेशियों से मुक्ति पाने में,
पूर्ण स्वतंत्रता, आंतरिक कमजोरियों से मुक्ति पाने में ।

विदेशियों से घ्रणा करके उनको दूर कर दिया,
पर देश से प्रेम करना नहीं सीख पाये ।

स्वामी विवेकानंद जी के प्रसिद्ध अमेरिका भ्रमण के दौरान, किसी अमेरिकन ने उनकी धोती दुपट्टे वाली वेषभूषा देखकर comment किया – “He does not appear to be a gentleman.”

स्वामी विवेकानंद – “Oh! In this country gentlemen are made by Tailors ?
In our country gentlemen are made by character.”

(Dr. P. N. Jain)

परीक्षा तो खुद ही देनी होगी, चाहे परीक्षा देते देते पसीना क्यों ना आ जाये ।
परीक्षा में सफ़लता पाने पर कुलपति/राष्ट्रपति आपको सम्मानित करने आ जायेंगे ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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