कभी ये मत सोचिए कि अब इस उम्र में कुछ नहीं रहा।
सूखे मेवे हमेशा ताजे फलों से महंगे होते हैं।

(दिव्या जैन)

कविता में अनुशासन होता है; शब्दों का Repetition न होने आदि का।
इसीलिये उसे बार-बार सुनने का मन होता है, सुहावनी होती है।
गद्य में ऐसा नहीं।
ऐसे ही बोलने में अनुशासन (हित, मित, प्रिय) होना चाहिये, तब लाभ ज्यादा। इसीलिये आचार्य ने कहा → प्रमत्त-योगात्प्राण-व्यप-रोपणं हिंसा यानी प्रमाद के साथ बोलना (योग) हानिकारक है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Addiction बुरी चीजों का तो बुरा होता ही है, अच्छी आदतों का भी अच्छा नहीं होता।
चाहे वह पूजा/ स्वाध्याय/ दानादि का ही क्यों न हो! अच्छी लत से मान होता है, पूरी न होने पर क्रोध आता है।

मुनि श्री शीतलसागर जी

विद्या को बांटा नहीं जाता बल्कि योग्य व्यक्ति को खोजकर दी जाती है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

दो दिन जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण होते हैं – एक जब आप पैदा होते हैं और दूसरा जब आप जानते हैं कि क्यों?

आचार्य श्री विद्यासागर जी

प्रत्यक्ष से ज्यादा उसकी कल्पना में आनंद आता है। कल्पना का अंत नहीं, साक्षात दर्शन के बाद अंत आ जाता है।
मूर्ति के निमित्त से मूर्तिमान की कल्पना में भक्त खोया रहता है।

क्षु.श्री जिनेन्द्र वर्णी

आँखों का बंधन, पैरों का मर्दन, पेट के लंगन का यदि उल्लंघन किया तो निरोग कैसे रहोगे !

आचार्य श्री विद्यासागर जी

????????????????????????????????
गन्ने में जहाँ गाँठ होती हैं, वहाँ रस नहीं होता…!
जहाँ रस होता हैं, वहाँ गाँठ नहीं होती…!

बस जीवन भी ऐसा ही है,
यदि मन में किसी के लिए नफ़रत की गाँठ होगी,
तो हमारा जीवन भी बिना रस का बन जाएगा…!
जीवन का रस बनाए रखना हो तो….
नफ़रत की गाँठ को निकलना ही होगा…! ????
????????????????????????????????

(सुरेश)

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

September 2026
M T W T F S S
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930