कुण्डलपुर यात्रा में टैक्सी ड्राइवर माध्यस्थ Speed से चल रहा था (80/90 k.m./h)।
कारण ?
पेट्रोल बचाकर इनाम पाया (1 हजार रुपये का)।
हम भी जीवन में Optimum Speed रखें (न कम, न ज्यादा) तो कार रूपी शरीर को स्वस्थ रखेंगे, पूरी उम्र जियेंगे।

चिंतन

तुम अगर चाहते तो बहुत कुछ कर सकते थे/ बहुत दूर निकल सकते थे।
तुम ठहर गये, लाचार सरोवर की तरह;
तुम यदि नदिया बनते तो, कभी समुद्र भी बन सकते थे।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

सौभाग्य → त्रैकालिक (भूत, भविष्य, वर्तमान)।
अहोभाग्य → वर्तमान का।।
(अहोभाग्य जो सौभाग्य को Cash करले)*
इसलिये अहोभाग्य, सौभाग्य से बहुत महत्वपूर्ण है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

* Cash न कर पाये तो दुर्भाग्य

धर्मात्मा पुण्यहीन …. पुजारी, पूरा जीवन गरीबी के साथ धार्मिक क्रियाएँ करता रहता है।
धर्मात्मा पुण्यवान …. आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

धर्म संसार की चकाचौंध से दूर तो नहीं कर सकता।
पर धर्मरूपी (धूप का) चश्मा लगाने से आँखें खराब नहीं होंगी।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

गृहस्थ हर समय धर्मध्यान करे तो गृहस्थी नष्ट (जैसे साधु की)।
धर्मध्यान न करे तो गृहस्थी भ्रष्ट।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

हिंसा/ झूठादि पाप हैं तो अहिंसा/ सत्यादि पुण्य क्यों नहीं ?
अहिंसादि व्रत हैं जो पुण्य से बहुत बड़े/ ऊपर हैं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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