आकांक्षा
कांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्त्तव्य पर कम हो जाती है।
इससे विशुद्धि/ शांति भी कम हो जाती है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र 7/23)
कांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्त्तव्य पर कम हो जाती है।
इससे विशुद्धि/ शांति भी कम हो जाती है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र 7/23)