उत्तम त्याग धर्म
जीवन में संयम धारण करने के बाद त्याग के भाव आना चाहिए/ आते ही हैं।
दान के लिए धन संग्रह समझदारी नहीं। यह तो ऐसा ही हो गया कि शांति के लिए पहले हम अशांत हों।
शरीर आदि को पर पर कहते हुए भी हम उसमें तत्पर क्यों रहते हैं !
एक डब्बे में सात डंडियाँ टाइट करके भरी हुई हैं, उल्टा करने पर भी गिर नहीं रहीं हैं। लेकिन एक डंडी को हम निकाल देते हैं तब बाकी छह अपने आप पर गिर जाती हैं। उस डंडी का नाम है “धन”, इसका त्याग करते ही, शरीर/ घर/ पत्नी/ संतान/ मित्र/ शत्रु सब अलग होने लगते हैं।
विचार तो करें…यह धन हम पाप से कमा रहे हैं, पापियों के लिए, पाप में लगाने के लिए!
अब तो इसका सदुपयोग कर अपनी समझदारी का परिचय दें।
मुनि श्री सौम्य सागर जी महाराज




2 Responses
उत्तम त्याग धर्म में अपने अंदर के विकारों का त्याग करना परम आवश्यक है। अन्दर के विकारों में मोह,आशाक्ति, परिग्रह, अंहकार,लोभ,लालच आदि का त्याग करना परम आवश्यक है। इसके अतिरिक्त बाहरी वस्तुओं जो उपलब्ध है,उनको जरुरत बन्धो को दान करना परम आवश्यक है।धन,दोलत को परमार्थ क्षेत्र में दान करना भी उत्तम त्याग है।
Quite a thought-provoking post ! Namostu Gurudev !