प्यास
पानी को भी पानी की प्यास होती है तभी तो नदी समुद्र की तरफ दौड़ती है।
यदि यह प्यास समर्पण के लिए हो तो फिर नदी को समुद्र बना देती है, बहुत बड़ा/ विशाल बना देती है। यदि समर्पण/ देने का भाव ना हो तो प्यास प्यास कह कर के दम तोड़ देते हैं। मृगमरीचिका वाली प्यास में भी जीव प्राण त्याग देता है, जहाँ पानी है ही नहीं उससे प्यास बुझाना चाहता है।
मुनि श्री प्रमाण सागर जी




2 Responses
चोरी का दोष का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु चोरी से बचना परम आवश्यक है।यदि जीवन में चोरी हो जावे तो उसका प्रायश्चित करना परम आवश्यक है।
Bahut hi sundar post hai !Namostu Gurudev !