जो प्रिय वचन नहीं बोलता, वह गूंगा है।
ज़ुबान दो काम करती है ••• रस लेने का और बोलने का भी। ख़ुद रस लेने के साथ-साथ दूसरों को भी रस आये, ऐसा बोलना चाहिए।
गूंगा भी इशारों से अपना काम चला लेता है।
शब्दों के घाव बहुत गहरे/ दुखदाई होते हैं।
किसी के अंत समय में अगर आपके कठोर शब्द याद आ गए तो उसका अंत ख़राब हो सकता है, जीवन भर की साधना मिट्टी में मिल सकती है।
बोलते तो वही हो जो जानते हो, सुनने में वह भी आता है जो आप नहीं जानते।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 3 मई)

समाधान नहीं ढूंढ पाने पर वे समस्या बन जाते हैं। क्योंकि समाधान और समस्या दोनों ही एक स्थान पर रहते हैं। जन्म मरण भी प्राय एक ही स्थान पर होता है, अचानक की बात दूसरी है जैसे गर्मी के समय में दूर कहीं हिमपात हो रहा हो तो अनायास मौसम ठंडा हो जाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 3 मई)

व्यसन (चोरी भी व्यसन है, हालांकि इसे पांच पापों में गिना जाता है) त्याग में दक्ष कौन ?
सर्वथा त्यागी, यानी मुमुक्षु (मोक्ष सिर्फ चाहता नहीं, उसके लिए हमेशा त्याग करता/ त्याग करने के लिए तैयार रहता) जैसे मुनिराज।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 2 मई)

 

पूर्व से लेकर आयी हुई आयु को क्या हम बढ़ा सकते हैं?
नहीं, किंतु घटा जरूर सकते हैं, जैसे तिजोरी में रखा धन बढ़ नहीं सकता, पर लापरवाही बरतने से घट जरूर सकता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 28 अप्रैल)

सूर्य ही एक ऐसा नक्षत्र है जिसकी सुबह और शाम की लालिमा एक सी होती है/ उन्नति और अवनति के समय समता भाव। प्रकाश और ताप देते समय भी कभी भेदभाव नहीं करता, सबको  समान रूप से देता है और बदले में कुछ पाने के भाव भी नहीं रखता।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 26 अप्रैल)

साँझ-सकारे/ क्षितिज पर खिलें/ रंग होली के,
उगे या ढले/ सूरज आह्लादित/ रंगत वही,
हानि लाभ में/ जीवन मरण में/ समरसता।

-कमल कान्त जैसवाल

दान को खर्चे में कभी मत डालना।
खर्चा होने पर लौटकर नहीं आता जबकि दान ब्याज सहित लौटकर आता है/ बीज रूप है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

संवाद → संवाद से शंकायें दूर होती हैं, सामंजस्य बैठता है।
विसंवाद → 1. सत्य जानते हुए भी सामने वाले के तथ्यों को काटना।
2. सत्य मालूम नहीं पर तुम जो कह रहे हो वह असत्य ही है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

शादी में हल्दी(प्राकृतिक) चढ़ते समय कपड़ों पर हल्दी लग गयी। शरीर को स्वास्थ्यवर्धक तथा एक दो धुलाई में साफ।
सामूहिक कपड़े धुलते समय रंगीन कपड़ों के रंग(अप्राकृतिक) सफेद कपड़ों पर लग गये, स्वास्थ्य को नुकसान तथा रंग छूटा ही नहीं, कपड़े बर्बाद।

चिंतन

शेर ने सब जानवरों से अपना चित्र बनवाया।
जिराफ़ के चित्र में शेर की पीठ थी। अन्य जानवरों के चित्र भी दायें, बायें, आगे, पीछे के भाग को दिखा रहे थे। अलग-अलग मत, पर मन भिन्नता नहीं (सभी एक ही शेर को दर्शा रहे थे)।
सिर्फ मुर्दों में मत भिन्नता नहीं होती। मत भिन्नता तो जीवित होने का प्रमाण है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

तीन दिन तक यदि किसी ने पानी भी ना पिया हो पर मिठाई का नाम लेते ही मुँह में पानी पानी हो जाता है।
तो वह पानी कहाँ से आया ?
पूर्व संस्कार/ रसना इंद्रिय के प्रति लोलुपता।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 22 अप्रैल)

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