सोना तप कर शुद्ध, चमकदार ही नहीं अपनी अकड़ छोड़ मुलायम हो जाता है।
यदि हम तपने से घबराते हैं तो अपने को सोना नहीं, सोने वाले मानें।

चिंतन

इंद्रियों आदि के कार्य…
सिर्फ़ ग्रहण करते हैं… कान, आँख, नाक, रसना, स्पर्श इंद्रियां, माथा(आशीर्वाद), पैर (मंजिल)
सिर्फ़ त्याग करते हैं… फेफड़े (गंदी हवा)
ग्रहण भी और त्याग भी… मन के द्वारा हालांकि अच्छी चीजों का कम, बुरी का ज्यादा, हाथ (त्याग करते समय छोटे हो जाते हैं, लेते समय फैल जाते हैं)।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 11 मार्च)

Positive Thinking…जैसे आशीर्वाद मिलेगा ही। सोच को बदलते रहना चाहिए।अस्थाई। अपेक्षा सहित।
Real Thinking…….जैसे गुरुओं/ बड़ों को नमस्कार हमेशा करूंगा, आशीर्वाद मिल भी सकता है या ना भी मिले। असफलता को स्वीकारना। स्थाई। अपेक्षा रहित।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 6 मार्च)

मुक्ति के दो प्रकार –

  • रस्सियों (कर्मों की) को तोड़कर भागना। इसके लिए बलशाली होना पड़ेगा। जितने कर्म बंध रहे हैं, उससे ज्यादा तोड़ें।
  • नयी रस्सियों बांधना बंद कर दें। पुरानी समय आने पर सड़-सड़ कर गिरती रहेंगी।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

उच्छवास/ Inhale – श्वास अंदर लेना।
प्राण/ अपान/ श्वास/ Exhale – बाहर निकालना।
श्वास अंदर लेते हैं तो बाहर भी निकालना ज़रूरी है, अन्यथा प्राण बाहर निकल जायेंगे। धर्म में निकालने को प्राण कहा है।
जितनी कमाई करो उसी के अनुपात में दान न होगा तो Balance कैसे होगा !

चिंतन

सबसे बड़ा विश्वसनीय कौन ?
जो अच्छे और बुरे की जिम्मेदारी खु़द लेते हों और इसमें अग्रणी हैं, मुनिराज। जो अनजाने में हुई गलतियों के लिए भी दिन में तीन बार प्रतिक्रमण करके अपने को दोषी स्वीकारते हैं।
जो बुरे का ज़िम्मा ले वह गुरु और जो अच्छे का ही ज़िम्मा ले वह ग़ुरूर कहलाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 6 मार्च)

मोक्षमार्ग में….

  1. कारण …बीज/ संसार। पेड़ पौधे तक कारण हैं क्योंकि वे हमें संसार में जिंदा रखने में सहायक है। इसलिये उनके प्रति उदार-चित्त रखना होगा उधार-चित्त (*Split Personality) नहीं।
  2. कार्य …फल/ सिद्धि (मोक्ष)।

ब्र.(डॉ.) नीलेश भैया

*Split Personality -हम अपनों के प्रति तो इतना दया भाव रखते हैं , मनुष्य जाति के प्रति दया भाव भी रखते हैं, (थोड़ा बहुत ) पर पेड़ पौधों, तिर्यंच के लिये नहीं जो हमारे जीवन के आधार हैं।

ऐसी स्वानुभूति करो कि किसी की सहानुभूति की आवश्यकता ही न रह जाये।

आचार्य श्री विद्यासागर जी (आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी)

ना “श्री” भटकाती है, ना ही “श्रीमती”, बस “मति” भटकाती है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी (आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी)

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