Category: चिंतन
पुरुषार्थ / भाग्य
पुरुषार्थ—> जन्म लिया है तो उड़ना तो होगा ही (वरना हिंसक जीव घात कर देंगे)। भाग्य—> अंत में धरातल पर आना(मरण) भी निश्चित है। चिंतन
प्राकृतिक / अप्राकृतिक
शादी में हल्दी(प्राकृतिक) चढ़ते समय कपड़ों पर हल्दी लग गयी। शरीर को स्वास्थ्यवर्धक तथा एक दो धुलाई में साफ। सामूहिक कपड़े धुलते समय रंगीन कपड़ों
उपकार
प्राय: हम उन पर उपकार करते हैं जिन्होंने पहले हम पर उपकार किया हो। यदि सभी यही सोचेंगे तो उपकार करने की पहल कौन करेगा
दुःख
व्यक्ति जीवित है/ होश में है, परीक्षण के लिये नुकीली चीज पैरों में चुभा कर देखते हैं। दुःख भी ऐसे ही हैं, हमको एहसास दिलाते
आत्मा / शरीर
हम मकान क्यों/ कब छोड़ते हैं ? Contract की अवधि पूरी होने पर। समय पूरा होने से पहले मकान जीर्ण-शीर्ण हो जाये। आत्मा भी शरीर
पर
“पर” तो संसार में भी अवांछनीय है, ये काम हो तो सकता है “पर”। परमार्थ में “पर” (दूसरे) पर उपयोग गया तो “मैं” से हटा।
आत्मा की जागरूकता
कैसे पता लगे कि मेरी आत्मा जाग्रत है या नहीं ? सुबह जगने आदि के लिये आत्मा को संबोधन करें कि मुझे इतने बजे जगा
ध्यानस्थ
ध्यानस्थ… भौंरे को फूल पर गुनगुनाते समय पराग का स्वाद नहीं आता। जब स्वाद लेता है तब गुनगुनाता नहीं। ब्र. प्रदीप पियूष हम भी गृहस्थी
माना
गणित में सवाल हल करते समय, “माना कि” से सवाल हल हो जाते हैं। पर जीवन में जो तुम्हारा है नहीं, उसे अपना मान-मान कर
कांटे
कांटों का भी अपना महत्त्व होता है। यदि वे न होते तो हम कितने कीड़े मकोड़ों को कुचलते चले जाते तथा फूल भी सुरक्षित न
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