Category: डायरी

कषाय

चारों कषायें इंटरचेंजेबल हैं। मान की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध आ जाता है, क्रोध से सफलता नहीं मिलती तो मायाचारी करने का लोभ आता

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परम्परा

परम्परा का कर्ज़ लिया नहीं चुकाना होता है। प्रो. शर्मा जी – जब दिगम्बर साधु न हों तब नकली साधु बनाकर इस परम्परा को बनाये

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आदर

न्यूनतम अनादर (दुश्मन/ सूक्ष्म जीवों का भी) करने वाला ही अधिकतम आदर का पात्र होता है। ब्र. डॉ. नीलेश भैया

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पद / प्रतिभा

पद मिले, प्रतिभा न रहे तो धृतराष्ट्र बनते हैं। प्रतिभा रहे, पद न मिले तो कर्ण। (सुरेश – इंदौर)

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भूत / भविष्य

भूत को यदि नहीं भुलाओगे तो भविष्य भूलना पड़ेगा। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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समाधि

उपधि = परिग्रह। उपाधि = बौद्धिक बीमारी, मेंटल नहीं। बुद्धि को मेन्टेन नहीं कर पा रहा, इसीलिए तो उपाधि चाहिए। इन दोनों से जब व्यक्ति

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आत्मदर्शन

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… यदि अपनी आत्मा के दर्शन/ अनुभूति नहीं कर पा रहे तो दूसरों में आत्मा के दर्शन/ देखना शुरू

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शरीर

शरीर को पूज्य बनाने के दो तरीके… 1) शरीर को पूरा अपना मानो। तब ऐसे काम होंगे ही नहीं कि कोई निरादर कर पाए। 2)

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सम्मान

त्याग की मूर्तियों के सामने गृहस्थों का सम्मान करना कहाँ तक उचित है ? त्यागियों के सामने त्याग का सम्मान करना तो तर्कसंगत है ही

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सुंदरता

प्रगति/ बढ़ते हुए को अच्छा माना जाता है, सुंदर कहा जाता है पर ढलता हुआ सूरज क्यों ज्यादा सुंदर लगता है ? योगेंद्र आध्यात्मिक/ परिपक्व

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मंगल आशीष

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