Category: डायरी
संगति
अच्छे की संगति से और अच्छे बन सकते हैं, वैसे ही बुरे की संगति बुराईयों को और बढ़ा देती है। जैसे हीरा हीरे को तराश
मंदिर/तीर्थ सीढ़ियाँ चढ़कर ?
मंदिर/तीर्थ सीढ़ियाँ चढ़कर ही क्यों बनाये जाते हैं ? ताकि एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुये महसूस करें… 1. बुराई/कमज़ोरियों से ऊपर उठ रहे हैं। 2. विशुद्धता
विनयवान
“विद्या ददाति विनयम्” यानि विद्या विनय लाती है। यदि मैं विनयवान नहीं हूँ तो इसका अर्थ हुआ कि मैं विद्यावान भी नहीं हूँ। (ब्र.नीलेश भैया)
घमंड
घमंड दबे पांव आता है, छम छम करता हुआ नहीं। एकता – पुणे (प्रतिक्रिया निकलती है छम छम करके)
नकल में अकल
राजा के दरवाजे से एक भिखारी पीठ रगड़ रहा था। राजा को दया आयी कि इसका कोई साथी भी नहीं है, धन दिया। अगले दिन
संभवता
संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है… असंभव से भी आगे निकल जाना। (अनुपम चौधरी)
धन / उपयोगिता
धन से नहीं, मन से अमीर बनें, क्योंकि मंदिरों में स्वर्ण कलश भले ही लगे हों लेकिन नतमस्तक पत्थर की सीढ़ियों पर ही होना पड़ता
निस्सार
संसार की निस्सारता वही समझ पाते हैं जिनमें कुछ सार हो। (पापी/ भोगी के जीवन सारहीन, वे संसार की निस्सारता को क्या समझेंगे !)
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