Category: डायरी

स्वर्ग / नरक

स्वर्ग/नरक हैं भी या नहीं ? हैं तो, क्यों ? सुख/दुःख तो हम यहाँ ही भोग रहे हैं ? संसार के उत्कृष्ट सुख/दु:ख से भी

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पापी-पेट

जो पाप रूप सामग्री पेट में डालते हैं तथा पाप करते हैं, उनका पापी-पेट । साधु, शुद्ध सामग्री लेने वाले का पेट पापी कैसे ?

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जीवन-यात्रा

जीवन-यात्रा… “क्या नहीं” से “क्या है” तक की ही होती है । प्यार पाने (प्यार तो कुत्ते से भी मिल जाता है) से इज्जत पाने

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विज्ञान

ज्योतिष-विज्ञान असफल हो सकता है, क्योंकि बहुत से जीवों की एक सी ग्रहदशा होती है । पर स्वर-विज्ञान नहीं क्योंकि वह हर व्यक्ति की विशेष

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धोख़ा

उड़ती हुई धूल को गुलाल मानना तो आसान है, पर आंखों में फेंकी धूल को गुलाल कैसे मानें ? यश-बड़वानी आ.श्री विद्यासागर जी कहते हैं

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ध्यान

ध्यान में मन भटकता क्यों है ? जिनका मन दिन-भर भटकता है, उनको रात में सपने बहुत आते हैं और भटकने वाले होते हैं ।

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भोग

भोग को मिठाई की तरह भोगोगे (स्वाद ले ले कर, खूब मात्रा में) तो दवाई खाना पड़ेगी । दवाई की तरह लोगो (मजबूरी/ कम मात्रा

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ज्ञान / विज्ञान / धर्म

ज्ञान – जानकारी देता है, आकर्षण का निमित्त बनता है । विज्ञान – उस ज्ञान को Analyse करके, भौतिक सुविधायें देता है । धर्म –

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मंगल आशीष

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