Category: डायरी

त्याग

त्याग दो प्रकार का — 1. संग्रह किये हुये को छोड़ना 2. संग्रह करना ही नहीं

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ख़ुश रहना

खुश रहना है तो – अपनों में रहो, सांसारिक दृष्टि से । अपने में रहो, आध्यात्मिक दृष्टि से । आपे में रहो, सामान्य दृष्टि से

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गुरु

आचार्य श्री ज्ञानसागर जी (आ. श्री विद्यासागर जी के गुरु) कहा करते थे – 2 रु. की हाँड़ी लेने से पहले ठोंक-बजा कर लेते हो,

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पुरुषार्थ / आशीर्वाद

पहले अपने आत्मविश्वास/ पुरुषार्थ से समस्याओं को निपटाओ, न निपटे तब भगवान/ गुरु की शरण में जाना; लेकिन वहां भी अपनी भक्ति के विश्वास पर

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बुरा समय

परिंदे शुक्रगुज़ार हैं, पतझड़ के, तिनके कहाँ से लाते, यदि सदा बहार रहती । यश जैन – बड़वानी

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माँ भक्त

आज के माँ-भक्त, हाथ पर माँ का टैटू बनवाकर, माँ से दूर चले जाते हैं ।

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कर्म

ज्ञानीजन, कर्कशा पत्नि/दुर्जन पुत्र का नाम ही कर्म रख लेते हैं । पापोदय को काटने में सहजता हो जाती है ।

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राग और तप

सूर्योदय लाल होता है (राग का प्रतीक) दोपहर तपते तपते सफेद/तेजस्वी; राग को कम/खत्म करने के लिये तप बहुत महत्वपूर्ण है । सूर्यास्त फ़िर लाल

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मंगल आशीष

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