मिट जाते हैं, मिटाने वाले;
लाश कहाँ रोती है !
रोते हैं जलाने वाले ।

(N.S.Jain)

जब निंदा करना ग़लत है, तो स्वयं की निंदा करने को क्यों कहा ?

ताकि मद न आये,
साथ-साथ अपनी प्रशंसा पर भी रोक ज़रूरी;
अपनी प्रशंसा से दूसरों की निंदा हो ही जाती है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

कंजूस अनुपयोगी,
फिजूलखर्ची दुरुपयोगी,
मितव्ययी सदुपयोगी।
उदारता तब आयेगी, जब आपकी आसक्त्ति कम होगी।
आसक्त्ति कम तब होगी,
जब आप सम्पत्ति/ जीवन की नश्वरता को समझेंगे।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

क्रोध, मान, माया, लोभ तथा काम-वासना की भी उत्तेजना होतीं हैं।
उत्तेजना = कषाय आदि का तीव्र रूप, जिसमें कुछ भी करने को तैयार, मरने-मारने को भी।
क्रोधादि को तो रोक नहीं सकते पर उनकी उत्तेजना Avoidable है।
उत्तेजित को कहते हैं – मानांध, कामांध आदि।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सूअर नीचे गिरे फल ही नहीं खाता उस पेड़ की जड़ भी खा जाता है और ऊपर सिर उठाकर देखता भी नहीं है, गर्दन ही ऐसी है कि कृतज्ञता करने वाले की ओर देख भी नहीं सकता।
(इसीलिए उसके नाम को ही गाली मानते हैं)

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

व्रतियों की बढ़ती संख्या देखकर ऐसा नहीं लगता कि ब्रह्मचारियों/ब्रह्मचारिणीयों की भीड़ बढ़ती जा रही है ?
आचार्य श्री – “अन्यथा शरणं नास्ति” ऐसा सोचकर ही तो धर्म में आये हैं।
धर्म में कभी भीड़ नहीं होती क्योंकि यहाँ सब अपना-अपना कल्याण करते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

साधु और शेर भोजन करके शांत, गृहस्थ और हाथी को जितना मिष्ठान/माल उतना उदंड।
डॉक्टर भी मोटापा कम कराने के लिये मीठा बंद कराते हैं।
साधु जानते हैं कि माल खाने से मद आता है।

मुनि श्री सुधासागर जी

पहले आगे के बाल क्यों उड़ते हैं ?
प्रकृति Indication देती है – आगे वाला समय (पहले वाला) उड़ गया, अब वह तो पकड़ में नहीं आयेगा।
पिछला वाला अभी बचा है, कम से कम उसे तो सम्भाल लो।

चिंतन

व्यक्ति दु:खी तो अपने कर्मों से होता है, फिर उस पर करुणा क्यों और कैसे आ सकती है ?
प्रथम दृष्टि से कर्म फल पर चिंतन सही है पर बाद में उसके लिये कुछ करने का विचार ज़रूर करें वरना दया/करुणा समाप्त ही हो जायेगी ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

राजा ने (निमित्त) ज्ञानी से पूछा –
मेरा कुल कैसा है ?
कुलीन नहीं है।
पता लगाया गया, राजा एक चरवाहे का बेटा था, जो गोद लिया गया था।
तुमने कैसे पहचाना ?
आप इनाम में भेड़-बकरियाँ देते हैं जबकि राजा तो सोना-चाँदी देते हैं।
प्रवृत्ति से औकात की पहचान होती है।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

संसार रोग रूप है जैसे रोग को ठीक करने के लिये –
1. रोग का स्वरूप जानना होता है।
2. कारण भी जानना होगा।
3. उससे बचने का साधन मालुम करने से ही रोग से मुक्ति पा सकते हैं।
संसार से मुक्ति पाने का भी यही क्रम/विधि है।

कमलकांत

बहुरूपिया महल के सामने साधुवेश रखकर ध्यान में लीन था।
सब लोग भेंट चढ़ा रहे थे, राजा ने भी हजार मुद्रायें चढ़ायीं। उसने किसी भी भेंट को छुआ भी नहीं।
अगले दिन दरबार में आकर 100 मुद्रायें मांगने लगा।
राजा- कल तुमने हजार मुद्रायें लेने से मना क्यों किया ?
कल मैं साधुवेश में था, यदि किसी की भी भेंट स्वीकारता तो साधुपद का अपमान होता।

ऊब – दो प्रकार की –
1. नकारात्मक – आलसी प्रवृत्ति वालों में
2. सकारात्मक – क्रियाशील/परिवर्तन को महत्त्व देने वाले की

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

बाढ़ के वेग में डूबना unavoidable है, पर शांत जल में लापरवाही से डूबने की जुम्मेदारी ख़ुद की है।
पापोदय में बीमारी आना समझ आता है, असावधानी से संक्रमित होना नहीं।

चिंतन

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

September 2026
M T W T F S S
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930