शिष्यों को – यदि कल्याण करना चाहते हो तो मात्र दो चीजें करना –
1. स्वयं तो गलती करना नहीं।
2. दूसरों की देखना नहीं।
बस इतनी साधना पर्याप्त है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जब कोई मर्यादा (औकात) से ज्यादा बातें करने लगे/परछायीं कद से ज्यादा बड़ी हो जाये तब जान लो – सूरज ड़ूबने वाला है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

धन तो सबने मिलकर भोगा, समाप्त कर लिया।
बचा क्या ?
धन कमाने में कमाया पाप, यह हमें अकेले ही भोगना होगा।
इसका कुछ अंशों में मार्जन दान से होगा, साथ-साथ पुण्य की कमाई होगी, आसक्त्ति तथा अहंकार कम होगा।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

नौ मलद्वारों में से, 2 One way हैं, 2 पर Natural Filters लगे हैं(आँखें), बाकी 5 Direct Highway (मुंह, नाक*, कान) हैं, इसलिये इन 5 पर Filter लगाना जरूरी है (बीमारियों तथा पिटने से बचने के लिये भी) ।

मुनि श्री सुधासागर जी

* नाक सिकोड़ने से भी झगड़े हो जाते हैं।

अपने और अपनों के दु:ख क्यों ?
मोह अज्ञान से।
कैसे ?
ख़ुद और सबको शरीर माना, आत्मा को नहीं।
बचने का उपाय ?
वैराग्य व सही ज्ञान।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

अच्छा वह जो बुराई छोड़ने के प्रयास में लगा है।
अच्छा बनने के लिये पहले बुरों/बुराइयों से दूर रहना होगा।
साफ कपड़े वाला गंदे कपड़ों वाले से दूर रहता है।

मुनि श्री सुधासागर जी

Call Centre में सामने वाली Party कैसा भी व्यवहार करे, Call Centre वाले पूरी नम्रता/शांति से व्यवहार करते रहते हैं।
कारण ?
उन्हें मालुम है कि Calls Record हो रही हैं।
क्या हमको नहीं मालुम कि हमारी भी हर क्रिया/कर्म खाते में जमा हो रहा है, जिसका पुरुस्कार/सज़ा हमको कर्म-फल के रूप में मिलेगी ही।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

एक व्यक्ति ने अपने सारे Targets 60 साल के होने तक पूरे करने का संकल्प किया।
60 साल के होने पर उनसे पूछा – कौन कौन से पूरे हुये ?
जवाब था – एक सपना ही पूरा हुआ, वह था 60 वर्ष का होना।
सिर्फ देखने/सोचने से सपने पूरे नहीं होते, पुरुषार्थ करना होता है।

ब्र.नीलेश भाई

एक ग़रीब बुढ़िया मंदिर बनवाना चाहती थीं।
पैसे कितने हैं ?
2 रुपये ।
इसमें मंदिर कैसे बनेगा ?
2 रुपयों के साथ 2 चीज़ें और हैं –
1. मेरा भगवान
2. उस पर मेरा विश्वास
और पिसनहारी का मंदिर बन ही गया, जबलपुर में।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

कलकत्ता का बेलगछिया का भव्य जैन मंदिर 26-27 बीघा के उपवन के बीच, शहर के मध्य स्थित है।
बनवाने वाले सेठ हुलासीराम बड़े अय्याश थे।
उनके हितैषी ने समझाया – जाने से पहले अपने पाप तो धो जाओ।
आज उनका नाम/निशान बना हुआ है, घर वालों का अतापता ही नहीं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम की माँ ने एक दिन जली रोटी अपने पति को दे दी।
उन्होंने शांति से खा ली।
कलाम के पूछने पर बताया – संसार में कोई भी पूर्ण नहीं होता, अपूर्णता को स्वीकारने में ही शांति/समझदारी है।
जीवन छोटा है, इसे दूसरों की ग़लतियाँ बताने, बाद में पछताने में व्यर्थ मत करो।

(डॉ.पी.एन.जैन)

आराधना क्यों ?
मन और गृह शांति के लिये ।
तो शांति मिली क्यों नहीं ?
क्योंकि अभी तक आराधना के उद्देश्य रहे –
1. संस्कार
2. दु:ख काटना/भौतिक आकांक्षा पूर्ति
3. पुण्य/स्वर्ग पाना ।
इन तीनों उद्देश्यों से आराधना करने वालों की श्रद्धा डगमगाती रहती है।
काम हुआ, श्रद्धा बढ़ी; नहीं हुआ आराधना कम या बंद।
जबकि होना चाहिये था – जीवन को पवित्र बनाना/आत्मा को निर्मल करना ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

प्रकृति ने तो मनुष्य की एक ही जाति बनायी है – “मनुष्य” (जैसे एकेन्द्रिय…पंचेन्द्रिय जीव) ।
मनुष्य ने उसमें कर्मों के अनुसार भेद कर दिये।
हर मनुष्य की चार जाति बन जाती हैं- सुबह-ब्राम्हण, दिन में वैश्य, शाम को क्षत्रिय, रात को शुद्र।
धर्म, भेद/लड़ाई नहीं कराता, धर्मों के अनुयायी कराते हैं;
वे आत्मा को ना तो जानते हैं, ना ही मानते हैं, इसीलिये बाह्य में जीते हैं।

आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी

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