राग – ये पेन्सिल अच्छी है ।
द्वेष – ये पेन्सिल बुरी है ।
मोह – ये पेन्सिल मेरी है/मुझे मिल जाये ।
सच्चा ज्ञान – ये तो बस पेन्सिल है, लिखने के काम आती है ।

इष्टोपदेश – (अंजू)

पुण्यात्मा व्यक्ति की महानता की कसौटी क्या है?
उस पर कष्ट कम आये या ज़्यादा; अंततः उसकी मृत्यु कष्ट से हुई, या शांति से: महानता इस पर निर्भर नहीं करती।
बल्कि इससे तय होती है कि उन कष्टों को उसने कैसे सहा। आकुलता, व्याकुलता से, या सहजता से !
दूसरे, उन कष्टों के लिये उसने अपने को ज़िम्मेदार माना, या दूसरों को !!

चिंतन

1) भगवान महावीर के 2621वें जन्म-कल्याणक पर सबको बधाई।
आत्मसंतोष/ अपरिग्रह के उपदेश पर ….

2) विकास/पुण्य भी दुविधा में डाल देते हैं –
दाल रोटी खाने को मिलती थी, तब नींद अच्छी आती थी।
कम नम्बर लाने वाले को दुविधा नहीं, Arts Subject ही लेना/मिलेगा, ज्यादा नम्बर वाले को बहुत सारे Option/दुविधायें।

मुनि श्री सुधासागर जी

मानव की सोच – वह संसार का सर्वश्रेष्ठ जीव है।
सत्य यह है कि – यदि आज पृथ्वी पर कीड़े मकोड़े (जिनको वह तुच्छ मानता है) समाप्त हो जायें तो कुछ समय में मानव/संसार समाप्त हो जायेगा।
लेकिन सारे मानव समाप्त हो जायें तो संसार और बेहतर हो जायेगा।

(डॉ.पी.एन.जैन)

पार्कों में कचड़ा न डाला जाए, इसलिए वहाँ देवताओं की मूर्तियाँ बैठा देते हैं।
इसी प्रकार अपने मन को अशुभ भाव रूपी कचड़े से बचाने के लिये पूज्य वस्तु का आश्रय लेकर शुभ भाव को उस पर स्थापित कर दो, जैसे किसी आकर्षक व्यक्तित्व को देखते समय उसके परमात्म-तत्त्व पर।

चिंतन

साधु देखते हुए और भी बहुत कुछ देखते हैं,
सुनते हुये और भी बहुत कुछ सुनते हैं जैसे किसी ने “मूर्ख” कहा तो वे ‘म’ ‘ऊ’ ‘र’ ‘ख’ सुनते हैं, इन अक्षरों से न राग होगा न द्वेष।

मुनि श्री सुधासागर जी

अदृश्य वायरस यदि आपको डरा सकता है,
तो अदृश्य भगवान पर श्रद्धा आपको बचा भी सकती है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

मानव गगन चुंबी अट्टालिकायें तो बना सकता है पर सूर्य के प्रकाश को पूरी तरह रोक नहीं सकता, वह ऊपर से प्रकाशित कर जायेगा।
हाँ ! पूर्ण लाभ लेना हो तो प्रकृति के पास जाना होगा – खुले मैदान, पहाड़, नदी/समुद्र किनारे या जंगलों में, सीमेंट के जंगलों में तो अवरोधित प्रकाश ही मिलेगा।

चिंतन

बाज़ार जाओ तो सेवक बन कर लिस्ट के अनुसार खरीददारी करो, मालिक बनकर गये तो चीजें आकर्षित करेंगी।
जैसे कैमिस्ट की दुकान पर पर्चे के अनुसार दवाई लेते हो न !
स्वादिष्ट/कीमती दवा तो नहीं लेते हो !!

मुनि श्री सुधासागर जी

चंदन के वृक्ष तो बहुत कम हैं/ कम ही बन सकते हैं।
नीम के बन जाओ, औषधि युक्त।
वह भी न बन सको तो जंगली पेड़ ही बन जाना, शीतलता दोगे/भूखे के भोजन बनाने में सहायक होगे।
पर कांटेदार झाड़ी कभी मत बनना।

घटना घटना होती है, उसका सुख-दु:ख से सम्बंध नहीं होता है ।
वरना बड़े बड़े ऑपरेशन हो ही नहीं सकते थे ।
ऐनसथिसिया देकर दर्द के दु:ख को चेतना/दिमाग/मन से अलग करके बिना दर्द/दु:ख के ऑपरेशन कर दिये जाते हैं ।
हम अन्य घटनाओं से मन/दिमाग हटा लें तो दु:ख भी नहीं होगा ।

आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी

किसी के पीछे ज्यादा नहीं पड़ना चाहिये –
इसका एक भव सुधारने के लिये अपने भव-भवांतर क्यों बिगाड़ना चाहते हो !
झगड़ा न करें पर Compromise भी ना करें।

मुनि श्री सुधासागर जी

Archives

Archives

April 8, 2022

September 2026
M T W T F S S
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930