बचपन में नियति वह सब देती है, जिसकी ज़रूरत होती है।
वृद्धावस्था में वह सब वापस लेती जाती है, जिस-जिस की ज़रूरत नहीं होती – पैरों की ताकत, दूर क्यों जाना !
इन्द्रियों की शक्त्ति, ताकझांक क्यों करना ! अपने में रहो।
(सुमन)
रोज़ वही पूजा पाठ से कुछ लोगों को ऊब आने लगती है।
वही लोग पाप भी रोज़ करते हैं, उससे ऊब क्यों नहीं होती ?
जो अगली कक्षा में नहीं चढ़ पाते/वही Course बार बार पढ़ने से बोर हो सकते हैं, जो लगातार अगली कक्षा में बढ़ते रहते हैं, वे बोर नहीं होते, नया-नया उत्साह/आनंद आता रहता है।
मुनि श्री सुधासागर जी
“एक वृक्ष लगाने में 100 संतान पाने का पुण्य मिलता है”,
ऐसा इसलिये कहा क्योंकि एक वृक्ष इतनी ऑक्सीजन देता है जो 100 बच्चों को जीवन भर के लिये पर्याप्त हो।
चिंतन
कर्त्तव्य – सबका/सब पर,
दायित्व – कुछ का/कुछ पर ।
(कर्त्तव्य में प्राय: कर्त्ता भाव आ जाता है)
आचार्य श्री विद्यासागर जी
संसार शोकमय,
काया रोगमय,
जीवन भोगमय,
सम्बंध वियोगमय;
बस, धर्म/सत्संग ही उपयोगमय होता है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आप चाय पी रहे हैं, किसी का धक्का लगा, चाय छलकी।
प्रश्न – क्यों छलकी ?
उसने धक्का दिया इसलिये छलकी।
ग़लत।
कप में चाय थी, इसलिये छलकी (ज्यादा भरी होगी तो ज्यादा छलकेगी)
आपको धक्का लगे तो क्या बाहर आयेगा ?
जो आपमें है वह – धैर्य/क्रोध/मान।
(सलौनी – सहारनपुर)
जो सब स्वीकार कर लें/ सबको स्वीकार लें – वह प्रभु।
हम प्रभु को स्वीकार लें/ प्रभु की स्वीकार लें तो हम भी प्रभु बनने की राह पर चलने लगेंगे।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
गुटका आदि व्यसनों से भक्त को ज्यादा पाप लगता है क्योंकि उनको तो प्रशस्त-पुण्य मिला था गुरु/भगवान की सेवा करने का, उस पुण्य को उन्होंने ऐसे कामों में बर्बाद कर लिया !
मुनि श्री सुधासागर जी
डाकू से बातें कितने आदरपूर्वक, ध्यान देकर पर अरुचि से करते हैं; मित्र से रुचिपूर्वक।
संसारीयों से पूरा ध्यान, आदर पूर्वक पर अंदर से अरुचिपूर्वक, परमार्थियों से रुचिपूर्वक बातें करें/सम्बंध रखें।
चिंतन
अकाल में भी जब सब ओर पानी समाप्त हो जाता है, आँख में पानी बचा रहता है (जब तक आदमी बचा रहता है)।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
सोने से बेहतर है, गहना बनना।
पर उसमें तो अशुद्धि मिलाई जाती है ?
पर थोड़ी अशुद्धि के साथ उसकी उपयोगिता भी तो बढ़ जाती है;
वह अशुद्धि भी तप के द्वारा सोने जैसी हो जाती है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
“प्रार्थना” से ज्यादा “आभार” प्रकट करना कारगर होता है।
प्रार्थना में नकारात्मकता/दीनता है/ अपने व्यक्तित्व को गिराना है/ अवसर कभी-कभी आते हैं, जब आप मुसीबत में फंस गये हों/ कर्म सिद्धांत पर विश्वास कम होता है/ अपने और अपनों के लिये होती है। आभार में ये सब नहीं है।
चिंतन
जिनसे मेरे कर्म कटें वे मेरे शत्रु कैसे !
जिनसे मेरे कर्म बंधे वे मेरे मित्र कैसे !!
आचार्य श्री विद्यासागर जी
खेल में हार न हो, सिर्फ जीत ही जीत हो तो खेल का आनंद क्या!
जीवन का आनंद लेना है तो हार को भी स्वीकारना होगा।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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