संस्कृति बनाये रखने में समीचीन साहित्य की प्रमुख भूमिका होती है। परन्तु वह साहित्य जीव के लिये उपयोगी होना चाहिये, उसके उपयोग से ही संस्कृति का निर्माण होता है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

लौकिक शिक्षा का अंत नहीं,
धार्मिक शिक्षा से बहुत कम में बहुत काम हो जाता है; इसे रटना नहीं पड़ता, सिर्फ समझना होता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

कर्म किया तो फल मिलेगा।
सेवक ने नहलाया तो सेवक को रोटी मिलेगी।
सेठ को नहलाया तो बची रोटी, भगवान को तो पहली रोटी, चुपड़ी, इज्ज़त के साथ।
यही सिद्धांत अन्य में भी लगा लेना – भोजन की थाली सजाई या पूजा की !!

मुनि श्री सुधासागर जी

समर्पण यानि अपने को आराध्य के लिये मिटा देना।
मिटाना यानि अपने मन को आराध्य के अनुसार चलाना।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

हे ! दीमको, शास्त्रों को खा-खा कर अपने नाम/दाम की भूख मत मिटाओ, संस्कार/संस्कृति बनाने में ज्ञान का उपयोग/प्रभावना करो ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

गुरु, रेडिओ की तरह Connection कराके शिष्यों को चलने योग्य बना देते हैं।
Fine Adjustment तो शिष्यों को खुद ही करना होता है (भावों में सुधार लाकर)।
तभी बाहर की आवाजें आना बंद हो पाती हैं।
मौसम (माहौल) बदलने पर विविध-भारती की जगह सीलौन आने लगता है, सो समय-समय पर सम्भाल करते रहना होता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

मंदिर से लौटते समय दूरी पर सत्संगी बहन दिखायी दीं ।
समझ नहीं पा रहा था कि वे मंदिर की ओर आ रही हैं या मंदिर से दूर जा रहीं है !
सही निर्णय किसी के पास आने पर ही होता है ।

चिंतन

बंधु वह जो हितकारी हो, चाहे पराया ही क्यों ना हो ।
अपने ही शरीर में होने वाली बीमारी – अबंधु,
जंगल की औषधि – बंधु ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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अहंकार सत्य को स्वीकार नहीं करता है,
और
सत्य को जानने वाला कभी अहंकार नहीं करता है।

जय जिनेंद्र

????????(अनुपम चौधरी)????????

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ख़ामोशी/ स्थिरता का भी अपना ही मज़ा है,
पेड़ों की जड़ें कभी फड़फड़ाया नहीं करतीं…
पत्ते फड़फड़ाते हैं तो सूख कर या टूट कर गिर ही जाते हैं।

????(मंजू)????

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