दोनों के भाव एक से होते हैं –
पुण्यात्मा = भगवान के दर्शन में नित नया आनंद ।
पापी = भोगों में नित नया आनंद ।
दोनों अगले जन्म में भी यही पाने के भाव रखते हैं ।
दोनों सोचते हैं इस जन्म में देरी से शुरू किया अगले जन्म में समय खराब नहीं करुंगा ।

मुनि श्री सुधासागर जी

अनुवाद (अनु = Follow + वाद = वचन ) नाम का कभी नहीं होता ।
दुर्भाग्य – भारत को India करने का क्या Justification था!
नाम से संस्कृति ही बदल दी ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(अनुवाद = दोहराना – शाब्दिक अर्थ; जैसे गुणानुवाद प्राय: एक भाषा से दूसरी भाषा के लिए प्रयोग होता है पर नाम तो संज्ञा है/पहचान है – कमल कांत जैसवाल)

मुनि श्री महासागर आदि 25 ब्रह्मचारियों की दीक्षा बहुत दिनों से रुकी हुई थी । वह सब आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास गए, निवेदन किया – कोई मंत्र दे दें, ताकि हम लोगों की दीक्षा हो जाए।
आचार्य श्री ने मंत्र दिया – “दीक्षा हो जाए” इसकी जाप जपो । थोड़े दिनों में दीक्षा हो गई ।
पहले मंत्र का फल तो मिल गया अब कोई और मंत्र ?
1. सबका कल्याण हो ।
2. समाधि-मरण हो ।
भावना भाने का जीवन में बहुत महत्व होता है ।

मुनि श्री महासागर जी

उलझनों से कैसे निकलें ?

1. उलझन में उलझें नहीं ।
2. आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते हैं – “उलझन” में से “उ” निकाल कर, समता का “स” लगा दें यानि “उलझन” “सुलझन” बन जाएगी ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

भगवान ने कहा – संयम/ त्याग/ ब्रह्मचर्य में आनंद है । सामान्य गृहस्थ को विश्वास नहीं होता ।
साधुओं ने पूरा संयम/ ब्रह्मचर्य करके दिखाया, खुद आनंदित/ दु:खी गृहस्थों को आनंदित किया ।
इससे भगवान के वचनों पर/ भगवान पर विश्वास होने लगा।

मुनि श्री सुधासागर जी

कमल इतना पवित्र/ सुंदर/ सुगंधित होते हुए भी जन्मदात्री कीचड़ से सम्बंध नहीं तोड़ता ।
हम बड़े होते ही !
(हाँ ! यदि भगवान के चरणों से सम्बंध स्थापित करना हो, तो कीचड़ से सम्बंध तोड़ना पड़ता है)

आचार्य श्री विद्यासागर जी

सारी घटनायें हमेशा पूर्व कर्मों का फल ही नहीं होतीं, संयोगाधीन भी होती हैं ।
सारे बैंक ट्रांजैक्शन पूर्व जमापूंजी के अनुसार ही नहीं होते बल्कि नए अकाउंट भी खुलते हैं ।
हर पल के लिए मैं और मेरे पूर्व कर्म ही जिम्मेदार नहीं है । एक हाथ से भी ताली बजती है कभी-कभी ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

सजावट के लिए बाजार से सामान लाना या घर में रखी चीजों से सजावट करना !
खुश रहने के लिए सामग्री जमा करना या जो भी हमारे पास है, उसमें खुश रहना !!
शादी के लिए अपनी Choice के लड़के लड़की Select करना या घर वाले, परिवार आदि देखकर जो लायें, उनके साथ Adjust करके खुश रहना !!!
स्थायी खुशी किसमें ?

चिंतन

अंतरंग-दर्शन के लिए चिंतन (चेतना है तो चिंतन होना भी चाहिए) ।
बाह्य-दर्शन के लिए उपनयन (“उप”-पास से, पर साफ दृष्टि होनी चाहिए तभी सही दर्शन होंगे) ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

एक ग्वालन लोगों को नाप नाप कर दूध दे रही थी बदले में पैसे ले रही थी ।
पास ही एक साधु हाथ में माला ले भगवान के नाम की जाप शुरू करने की तैयारी कर रहे थे । उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति को ग्वालन ने बिना पैसे लिए, बिना नापे, बड़ा बर्तन पूरे उ दूध से भर दिया । पता लगा
कि वह व्यक्ति उस ग्वालन का प्रेमी था ।
साधु ने माला छोड़ दी- “मैं अपने परम प्रेमी का नाम गिन गिन कर लेता हूँ, बदले में मोक्ष आदि की चाहना भी करता हूँ, मुझसे तो यह ग्वालन अच्छी है” ।

(ब्र.रेखा दीदी)

विज्ञान आगे बढ़ना चाहता है/बढ़ता भी है पर संस्कृति को कुचलते हुए ।
वीतराग-विज्ञान आगे बढ़ाता है संस्कृति को संरक्षण देते हुए ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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