हाथी लाख का, मरे तो सवा लाख का;
मनुष्य नाक का, मरे तो ख़ाक का;
पर मानता है अपने को लाखों का।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

दिन का हो या रात का, सपना सपना होय;
सपना अपना सा लगे, किन्तु न अपना होय।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

दिन के सपने मोह की नींद से,
रात के सपने शरीर की नींद से आते हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

साधु और पापी दोनों में ही संतोष दिखता/होता है।
बस दोनों की मंज़िलें विपरीत दिशा में होतीं हैं।
शकुनि ने अपनी बहन के साथ हुये अन्याय का बदला लेने के लिए कितने लम्बे समय तक संतोष रखा!
बहन/ जीजा को बदला लेने के लिये मना नहीं पाया तो भांजों के बड़े होने का इंंतजार करता रहा।

मुनि श्री सुधासागर जी

गन्ना पुराना, रस कम, निकालने में मेहनत ज्यादा, सो रस की कीमत भी ज्यादा।
वृद्धावस्था कबाड़े की चीज़ नहीं, Antique है/ कीमती है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(पुराने वर्षों से अनुभव ग्रहण कर उन्हें वृद्धावस्था की तरह कीमती बनायें)

दूसरों के यहाँ कुछ भी अच्छा/बुरा हो, हम कहते हैं – दूसरों के फटे में मैं क्यों पैर डालूँ।
पर कर्म भी तो दूसरे हैं, उसमें(कर्मफल में) इतना Involvement क्यों ?
जबकि देख रहे हो कि कर्मों के फटे (कर्म फटने/ फलित होने पर) में पैर डालने के नतीजे बुरे ही होते हैं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

1922-23 में आचार्य श्री शांतिसागर जी दक्षिण से उत्तर की ओर आ रहे थे।
लोगों ने उत्तर की कठिनाइयों के लिये निवेदन किया कि आप संकट निवारण के लिये कोई मंत्र सिद्ध कर लें।
आचार्य श्री…जिसे लोग णमोकार में जपते हैं उसका तो जीवन ही मंत्र है।
आचार्य श्री हैदराबाद पहुँचे तो वहाँ के निज़ाम अपनी बेगमों के साथ आगवानी करने पहुँचे;
कट्टरपंथियों ने टिप्पणियाँ कीं।
निज़ाम का जबाब था…इस राज्य में नंगों पर प्रतिबंध है, फ़रिश्तों के लिये नहीं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

प्राय: बेटे की कामना करते हैं पर केरल में बेटी की (गाय/भैंस के बछ्ड़ी की)
वास्तविकता यह है कि न हमको बेटे से मतलब है न बेटी से, हमें अपने स्वार्थ से मतलब है, बुढ़ापे में हमारी देखभाल जो करे, वह हमें प्रिय है।

मुनि श्री सुधासागर जी

संस्कृति बनाये रखने में समीचीन साहित्य की प्रमुख भूमिका होती है। परन्तु वह साहित्य जीव के लिये उपयोगी होना चाहिये, उसके उपयोग से ही संस्कृति का निर्माण होता है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

लौकिक शिक्षा का अंत नहीं,
धार्मिक शिक्षा से बहुत कम में बहुत काम हो जाता है; इसे रटना नहीं पड़ता, सिर्फ समझना होता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

कर्म किया तो फल मिलेगा।
सेवक ने नहलाया तो सेवक को रोटी मिलेगी।
सेठ को नहलाया तो बची रोटी, भगवान को तो पहली रोटी, चुपड़ी, इज्ज़त के साथ।
यही सिद्धांत अन्य में भी लगा लेना – भोजन की थाली सजाई या पूजा की !!

मुनि श्री सुधासागर जी

समर्पण यानि अपने को आराध्य के लिये मिटा देना।
मिटाना यानि अपने मन को आराध्य के अनुसार चलाना।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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