साधु/ व्रती सदैव याद रखें >>
दीक्षा अपने बल/भरोसे पर ली जाती है, औरों/समाज के बल पर नहीं।
व्रती को अपने व्रतों के नियंत्रण में रहना चाहिये, समाज के नियंत्रण में नहीं।
इसके लिये साधु को गृहस्थों से दूरी बना कर रखना चाहिये।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
हाइकु ….
“पाँचों* की रक्षा मुट्ठी** में,
मुट्ठी बंधी, लाखों की मानी”
आचार्य श्री विद्यासागर जी
एकता – सहयोग, समन्वय, समादर, संरक्षण से आती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
* 1) उँगलियाँ
2) इंद्रियां
3) परमेष्ठी
** प्रण/ शपथ लेते समय की मुद्रा।
संसारियों को आनंद नहीं, मज़ा (मिर्च मसाले वाला) चाहिये।
मज़ा में कर्म बंधते हैं, आनंद में कटते/ घटते हैं।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
भगवान में तो सैकड़ों सूर्य का तेज है, इनसे दूर से ही प्रेरणा लेना।
अपने काम कराने की प्रार्थना भी मत करना, भगवान आ भी गये तो जल कर भस्म हो जाओगे!
चिंतन
दोपहर नाम क्यों पड़ा?
सूर्योदय के दो पहर बाद जो समय होता है, उसे दोपहर कहते हैं।
मुनि श्री सुधासागर जी
सम्बंध शौक नहीं, मजबूरी है, संसारी जीवों के लिये ।
जब मजबूरी है तो झुककर निभाओ भी ।
सम्बंध जब टूटते हैं तो बैर बन जाते हैं ।
सम्बंध न बनें तो रोना, बन जाय तो रोना ।
मुनि श्री सुधासागर जी
मुनि श्री प्रमाणसागर ने किसी विषय पर आचार्यश्री से कहा – “ये मन को अच्छा नहीं लग रहा”
आचार्यश्री – मैने दीक्षा आत्मा को अच्छा बनाने को दी है न कि मन को अच्छा लगने को ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
संसार में ठगा, धर्म में आता है, धर्म में ठगा कहाँ जायेगा ?
लौकिक में ठगा धनादि खोता है पर अलौकिक जन्मजन्मान्तर खो देता है ।
तो क्या करें ?
या तो ख़ुद को सही की पहचान करने का ज्ञान हो वरना सच्चे गुरु के दिशा निर्देश में चलो ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
वासना का सम्बंध न तन से है न वसन* से,
अपितु माया से प्रभावित मन से है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
* पोशाक
आचार्य श्री विद्यासागर जी का स्वास्थ अच्छा नहीं था ।
मुनिजन वैय्यावृत्ति कर रहे थे । आचार्य श्री दीवार से पीठ टिकाये बैठे थे ।
पीठ पर वैय्यावृत्ति करने का विनय पूर्ण तरीका निकाला – ब्रह्मचारी भैया ! ज़रा दीवार पीछे खिसका देना ताकि हम पीठ की वैय्यावृत्ति कर लें ।
आचार्य श्री आगे खिसक गये – लो दीवार पीछे हो गयी ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
वैराग्य भाव आये पर संसारियों के साथ रहने की मजबूरी हो तो संसारियों को पता मत लगने देना वरना वे रहना दुश्वार कर देंगे ।
मुनि श्री सुधासागर जी
ध्यान आत्मा पर लगायें, शरीर पर नहीं ।
कारण ?
ध्यान एक पर केन्द्रित किया जाता है, आत्मा एक है, शरीर के अनेक अंग तथा शरीर पर ध्यान जाते ही उसके अनेक रोगों पर ध्यान चला जायेगा, आत्मा में तो रोग होते ही नहीं ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
प्रतिकार करना है तो सुख का करो, वरना सुविधाओं के आश्रित हो जाओगे ।
जिन्होंने किया, वे महान/ साधु/ भगवान बन गये जैसे राम/महावीर भगवान ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
Pages
CATEGORIES
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत – अन्य
- प्रश्न-उत्तर
- पहला कदम
- डायरी
- चिंतन
- आध्यात्मिक भजन
- अगला-कदम
Categories
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- Uncategorized
- अगला-कदम
- आध्यात्मिक भजन
- गुरु
- गुरु
- चिंतन
- डायरी
- पहला कदम
- प्रश्न-उत्तर
- वचनामृत – अन्य
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर

Recent Comments