Mathematics may not teach us how to add happiness…
and how to minus sadness.
But
It does teach one important thing…,
Every problem has a solution.
(Manju)
चित्र के साथ जब “वित्त”* जुड़ जाता है तब वह चित्र, विचित्र बन जाता है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
* जब चित्र(कला) से पैसा जुड़ जाता है, तब कला व्यवसाय बन जाती है/ अपना सौंदर्य खो देती है ।
स्व-शक्ति का भान भी होना चाहिये तथा ध्यान भी रखना चाहिये,
वरना अंधा पीसे, कुत्ते खांय ।
मुनि श्री सुधासागर जी
मोह आँख की किरकिरी है,
सही से देखने नहीं देता ।
मुनि श्री महासागर जी
सामने वाले के गलत क्रम में लगे बटनों को देखकर अपने बटन चैक करना, ताकि हंसी के पात्र न बन जाएं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
ज़िद, गुस्सा, लालच और अपमानादि….
खर्राटों की तरह होते हैं,
जो….
दूसरा करे तो चुभते हैं,
पर ख़ुद करें तो एहसास तक नहीं होता ।
(सुरेश)
धर्म क्रियात्मक यानि करना, जिसके करने से लोग धर्मीं कहें, आचार धर्म है ।
अध्यात्म विचारात्मक ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
कील वहीं ठोको, जहाँ अंदर चली जाए।
पत्थर पर ठोकोगे, तो वापस आकर तुम्हें ही घायल करेगी।
मुनि श्री अविचलसागर जी
पूर्ण सत्य तो भगवान ही जानते/कह सकते हैं ।
संसारी/संसार चलाने के लिये असत्य पर भी विश्वास करता है जैसे ज़हर से बनी दवा बीमारी को ठीक करती है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर;
आगे तीतर, पीछे तीतर, बोल कितने तीतर ?
तीन ।
नाम ?
भूत, वर्तमान, भविष्य ।
भूत के आगे वर्तमान तथा भविष्य रहता है, भविष्य के पीछे वर्तमान तथा भूत, वर्तमान के पीछे भूत तथा आगे भविष्य रहता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
जिनका स्वाध्याय/धर्म में मन लगता है, उनकी चिंता नहीं/चिंता करने की ज़रूरत भी नहीं ।
जिनका मन नहीं लगता, उनकी चिंता करने से लाभ नहीं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
परायों में अपनों को ढ़ूंढ़ना कठिन काम,
अपनों में* अपने को ढ़ूंढ़ना और कठिन,
अपने में अपने-आपको ढ़ूंढ़ना सबसे कठिन, पर सबसे उपयोगी भी ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
(* अपनों में परायों को ढ़ूँढ़ना भी बहुत कठिन )
आध्यात्म सिर है, धर्म शरीर ।
मुनि श्री सुधासागर जी
किसी भी कार्य सिद्धि के लिये अनुकूल वातावरण बहुत महत्वपूर्ण होता है ।
और उस वातावरण को बनाये रखने के लिये संयम आवश्यक है ।
मुनि श्री समयसागर जी
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