मोह आँख की किरकिरी है,
सही से देखने नहीं देता ।

मुनि श्री महासागर जी

सामने वाले के गलत क्रम में लगे बटनों को देखकर अपने बटन चैक करना, ताकि हंसी के पात्र न बन जाएं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

पूर्ण सत्य तो भगवान ही जानते/कह सकते हैं ।
संसारी/संसार चलाने के लिये असत्य पर भी विश्वास करता है जैसे ज़हर से बनी दवा बीमारी को ठीक करती है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर;
आगे तीतर, पीछे तीतर, बोल कितने तीतर ?
तीन ।
नाम ?
भूत, वर्तमान, भविष्य ।
भूत के आगे वर्तमान तथा भविष्य रहता है, भविष्य के पीछे वर्तमान तथा भूत, वर्तमान के पीछे भूत तथा आगे भविष्य रहता है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

जिनका स्वाध्याय/धर्म में मन लगता है, उनकी चिंता नहीं/चिंता करने की ज़रूरत भी नहीं ।
जिनका मन नहीं लगता, उनकी चिंता करने से लाभ नहीं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

परायों में अपनों को ढ़ूंढ़ना कठिन काम,
अपनों में* अपने को ढ़ूंढ़ना और कठिन,
अपने में अपने-आपको ढ़ूंढ़ना सबसे कठिन, पर सबसे उपयोगी भी ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(* अपनों में परायों को ढ़ूँढ़ना भी बहुत कठिन )

“M” और “W” एक दूसरे से उल्टे होते हुये भी एक दूसरे के पूरक हैं ।
“M” और “W” में तीन दिशाओं में तो Boundaries हैं, पर चौथी दिशा जो खुली हुई है, दोनों के मिलने पर Complete/ चार-दीवारी में सुरक्षित और संयमित हो जाते हैं ।

चिंतन

संस्कार मातृभाषा में क्यों ?
माँ से जो सीखा, उस भाषा को हेय दृष्टि से देखने लगे, तो माँ को भी उसी दृष्टि से देखने लगते हैं, तब उनके दिये संस्कारों को भी उसी तरह हेय देखेंगे, तब ग्रहण कैसे करेंगे ?
उनके प्रति आदरभाव कैसे रहेगा ?
यही अंग्रेजी का दोष है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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