जब तक शिक्षा का उद्देश्य नौकरी रहेगा तब तक समाज में नौकर ही पैदा होंगे, मालिक नहीं ।

मुनि श्री उत्तमसागर जी

संसार तथा परमार्थ की यात्रायें, सूक्ष्म से शुरु होकर अंत भी सूक्ष्म पर ही समाप्त होती हैं ।
जन्म/मृत्यु (एक cell से राख),
सूक्ष्म निगोदिया (जीव/कीड़े) से मोक्ष (आत्मा) तक ।

चिंतन

इसका शब्दार्थ क्या है और जाप करने से कर्म कैसे कटते हैं ?

“ज” जन्म, “प” पाप;
जो जन्म और पाप यानि संसार को समाप्त करे ।
इष्ट-देव की जाप करने से विशुद्धता/ऊर्जा आती है, जो कर्मों को काटती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

नाली की गंदगी साफ करने, नाली/गंदगी में उतरना होता है ।
पापों की सफाई करने, पापों में (स्वीकार करना होगा कि हम पापी हैं) ।
वह भी शुरु से(जीवन के प्रारंभ से), वर्तमान की सफ़ाई से शुरूवात की तो पहले की गंदगी सड़ती रहेगी/ जीवन में बदबू आती रहेगी ।

साधु, साधुता के अयोग्य आदतों को दूर करने की साधना में लगे हैं,
पर कभी कर्मों की ऐसी गठान आ जाती है, जहाँ साधना का cutter मौथरा हो जाता है/टूट जाता है ।
सारे तीर तो किसी के भी निशाने को बेध नहीं पाते हैं न !

मुनि श्री अविचलसागर जी

प्रण कब तक निभायें ?

प्रण निभाने में व्यक्तिगत लाभ होता है,
लेकिन वह प्रण जब समाज/देश/धर्म के लिये अहितकारी हो जाय तो तोड़ लेना चाहिये जैसे श्री कृष्ण करते थे ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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