बाह्य विकास करने की मनाही नहीं है, पर उसे Ultimate मत मानो ।
आंतरिक विकास बहुत महत्वपूर्ण और उपयोगी है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

गतिमान का विरोध ही नहीं, अंतर-विरोध भी होता है ।
पर दृढ़त/संकल्प इन विरोधों को Stepping Stone बनाकर अपनी प्रगति को बढ़ा देते हैं।
जैसे गति के लिये Friction आवश्यक है ।

चिंतन

आयुर्वेद का सूत्र …
पथ्य है तो औषधि की आवश्यकता नहीं,
और
यदि पथ्य नहीं है तो भी औषधि की आवश्यकता नहीं ।

पूत कपूत तो का धन संचे, पूत सपूत तो का धन संचे ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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“दर्द” एक संकेत है कि…
*आप जिंदा हो*,

“समस्या” एक संकेत है कि….
*आप मजबूत हो,*

“प्रार्थना” एक संकेत है कि…..
*आप अकेले नहीं हो*
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(अनुपम चौधरी)

धन और समय का ही दान नहीं होता बल्कि पांचों इन्द्रिय के विषयों का भी होता है,
जैसे 1 घंटे को सिर्फ भगवान को ही देखूंगा ।

मुनि श्री सुधासागर जी

आस्तिक्य गुण का अर्थ यह नहीं है कि मात्र अपने अस्तित्व को ही स्वीकार करना,
बल्कि…
दुनिया में जितने पदार्थ हैं, उनको यथावत/ उसी रूप में स्वीकार करना ।
जो दूसरों में जीवत्व को देखता है, उसे ही आचार्यों ने आस्तिक कहा है अन्यथा वह नास्तिक है ।

आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज

दीपावली के अवसर पर घरों के बाहर ख़ूब सजावटें की गयीं,
घरों के अंदर बस एक/ दो कागज़ के फूलों की माला !
बाहर की सज़ावटों को तो घर वाले यदाकदा देखते हैं और बाहर वाले तो यदाकदा ही आते हैं । यदि हमारी सज़ावटें उनकी सज़ावटों से कम हुईं तो उनको घमंड और हमको हीनता के भावों में कारण बन जातीं हैं, उनसे अच्छी हुईं तो हमको घमंड और उनको हीन भाव ।
अतः जीवन को अंदर से सज़ाना ज़्यादा महत्वपूर्ण है ।

चिंतन

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