मुंबई के अतिशय(12 वर्षीय) को बड़े और मित्र अलग-अलग नाम रख-रख कर चिढ़ाते थे, उसे बहुत बुरा लगता था ।
कुछ दिन पहले वह अपनी दादी से बोला…
अब मुझे नये-नये नाम बुरे नहीं लगते, क्योंकि भगवान के भी तो 1008 नाम होते हैं । जिस दिन मेरे 1008 नाम हो जायेंगे, मैं भी भगवान बन जाउंगा ।

इसे गोबर का कीड़ा कहते हैं, ये कीड़ा सुबह उठकर गोबर की तलाश में निकलता है और दिनभर जहाँ से गोबर मिले उसका गोला बनाता रहता है।????

शाम होने तक अच्छा ख़ासा गोबर का गोला बना लेता है। फिर इस गोबर के गोले को धक्का मारते हुए अपने बिल तक ले जाता है, बिल पर पहुंचकर उसे अहसास होता है कि गोला तो बड़ा बना लिया लेकिन बिल का छेद तो छोटा है, बहुत कोशिश के बावजूद वो गोला बिल में नहीं जा सकता।
हम सब भी गोबर के कीड़े की तरह ही हो गए हैं। सारी ज़िन्दगी चोरी, मक्कारी, चालाकी, दूसरों को बेबकूफ बनाकर धन जमा करने में लगे रहते हैं, जब आखिरी वक़्त आता है तब पता चलता है के ये सब तो साथ जा ही नहीं सकता !

(डाॅ. पी.एन.जैन)

आ.श्री विद्यासागर जी बहुत बार निवेदन करने पर भी सागर नहीं आ रहे थे ।
सुधासागर जी महाराज ब्रह्मचारी अवस्था में अन्य ब्रम्हचारियों के साथ आचार्यश्री को सागर आने के लिये निवेदन करने गये ।
आचार्यश्री – यहाँ सफेद बाल वाले आते हैं और चले जाते हैं पर काले बाल वाले आते तो हैं फिर जाते नहीं ।
उस समूह के अधिकांश ब्रम्हचारी, मुनि(श्री क्षमासागर जी आदि) बन गये हैं ।

जैन-दर्शानुसार आज के दिन भगवान महावीर की आखिरी दिव्यध्वनि(प्रवचन) सुनी गयी थी,
उससे भव्य जीवों का जीवन धन्य हो गया था (आज भी हो रहा है/ आगे भी होता रहेगा)
इसीलिए आज की तेरस को धन्य-तेरस कहा जाता है ।
हम सब भी अपने जीवन को तेरह तरह के चारित्रों(5 महाव्रत, 5 समिति, 3 गुप्ति) को धारण करके धन्य बनायें ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

गुरु की सुनते हैं, मानते नहीं हैं तो क्या यह मायाचारी है ?
नहीं लाचारी है । साधारण शिष्य श्रद्धालु होते हैं, अनुयायी नहीं ।
पर कम से कम लाल बत्ती पर रुको ज़रूर, हरी पर धीरे चलो/ना भी चलो, चलेगा ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

मृत्यु के बाद कुछ समय तक शरीर के अवयवों में जान उनके अपने-अपने Cells की Energy से बनी रहती है,
जैसे हर दुकान पर कुछ ना कुछ सामान Stock में रहता है तथा गोदाम से Supply आती रहती है । गोदाम में आग लगने पर दुकान कुछ दिनों तक तो सामान देती रहती है ।

चिंतन

घर बनाने में श्रम तो चिड़िया और मकड़ी दोनों करतीं है,
पर मकड़ी का अभिप्राय दूसरों को फंसाना है, सो अंत में खुद भी उसी में फंस कर मरती है ।
चिड़िया बच्चों को आश्रय देने के लिये बनाती है, सो खुद भी सुरक्षित रहती है ।

व्यापारी इसीलिए…’शुभ’ पहले लिखते हैं, ‘लाभ’ बाद में ।

आचार्य श्री ज्ञानसागर जी(आचार्य श्री विद्यासागर जी के गुरु) कहते थे …

मानी को मान दे देना चाहिये (उपद्रव नहीं करेगा) ।
वैसे भी ईंधन को सिर पर ही रखते हैं, अंत में तो उस बेचारे को जलना ही होता है ।

स्वर्ग/नरक हैं भी या नहीं ?
हैं तो, क्यों ? सुख/दुःख तो हम यहाँ ही भोग रहे हैं ?

संसार के उत्कृष्ट सुख/दु:ख से भी अधिक सुख/दु:ख हो सकते हैं ना !
उसे भोगने जहाँ जाना होगा, वही स्वर्ग/नरक हैं ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सोने की पहचान –
1. पीला रंग पीतल का भी, पर चमक में फर्क ।
2. अग्नि परीक्षा में और-और चमकता है ।

मूल्यवान का मूल्यांकन करना बहुमूल्य गुण है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जो पाप रूप सामग्री पेट में डालते हैं तथा पाप करते हैं, उनका पापी-पेट ।
साधु, शुद्ध सामग्री लेने वाले का पेट पापी कैसे ?
वे पाप काटते हैं, उन पापों को जो पेट में पहले के भरे हुए हैं ।

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