वचन तीन बार क्यों ?

पहली बार मंद सहमति,
दूसरी बार नकारात्मक (हाँ, हाँ….)
तीसरी बार पक्का ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

बुराई के प्रति आकर्षण होता ही नहीं है ।
जिसको बुरा सिर्फ कहा ही नहीं, मन से भी बुरा मान लिया,
जैसे कूड़ा/ज़हर, तो आकर्षण होगा !

मुनि श्री सुधासागर जी

भगवान का जन्मदिन मनाने के कई लाभ –
1. दूसरों की खुशी में शरीक होने का पुण्य ।
2. बड़े आदमी के उत्सव में शरीक होने से आपका रुतबा बढ़ता है, Return Gift भी बहुमूल्य मिलती है ।

जीवन को सुचारु रूप से चलाने/ सफ़ल बनाने…
1. क्रम से कार्य करना ।
2. ऐसे कार्य करना जिससे आगे का क्रम बन जाये ।

संसार भ्रमण का कार्यक्रम हमने खुद बनाया है,
खुद भोग रहे हैं,
खुद ही देख रहे हैं ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

“अगरबत्ती” अपने सहारे जलती है, इसलिये महकती है, फूँक मारने से भी बुझती नहीं है (और ज्यादा जलने लगती है),
जबकि “दिया”, घी/बाती/मिट्टी के सहारे, फूंक मारो तो अंधकार ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

नियति यानि योग्यता
आचार्य अकलंक देव स्वामी ने लिखा है – जिस कारण से जो कार्य होना है/हो सकता है, उसी से वह कार्य होता है ।
जैसे आँख की नियति देखना है, सुनना नहीं ।

मुनि श्री सुधासागर जी

स्व-नियंत्रण की पूर्णता ही मोक्ष है ।
नियंत्रण हो निज पै, दीप बुझे स्व सांस से (अनियंत्रण से) ।

आचार्य श्री विद्यासागर ञजी

कड़क सर्दी में आचार्य श्री विद्यासागर जी के शरीर में कांटे उठ रहे थे, भक्त के इंगित करने पर आ. श्री ने कहा –
शरीर का स्वभाव ही कांंटों वाला है, इसमें फूल थोड़े ही ना खिलेंगे !
शरीर को जानने से नहीं, बल्कि उसके स्वभाव को जानने से वैराग्य होता है

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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April 8, 2022

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