अतिभाव तथा अतिअभाव दोनों ही आकुलता देते हैं।*
समभाव से ही निराकुलता आती है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
*(अति-निर्देश भी)।
वृद्धों में प्राय: अंधविश्वास देखने में आता है।
युवाओं में अंधाविश्वास।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
अहंकार…
राजा भोज के दरबार में एक ज्ञानी ने कोरे कागज़ पर बिना कुछ लिखे बताया कि इस कागज़ पर एक सुंदर कविता लिखी है।
पर दिखेगी उसी को जो पवित्र होगा।
सबने कहा बहुत सुंदर-बहुत सुंदर।
क्षु. सहजानंद जी
पौधे कम खाद देने पर कम मरते हैं, ज्यादा खाद देने पर ज्यादा।
शरीर/ संसार के लिये Excess ज्यादा हानिकारक है।
मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
वृद्ध काँच के जार में रखी गोल्डफिश जैसे होते हैं।
हर एक की निगाह उन पर होती है। इसलिए उनको अपने आचरण के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिए।
कमलकांत
अपराध करना अधर्म।
उसका फल सहजता/ स्वीकृति के साथ सहना, धर्म।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
साधु का घर दूर है जैसे पेड़ खजूर,
चढ़े तो मीठे फल चखे, गिरे तो चकनाचूर।
मुनि श्री अजितसागर जी
तप/ ताप (गर्मी) से हम बहुत घबराते हैं। जबकि ताप के बिना न अनाज आदि पैदा होगा, ना ही उसे पचा (जठराग्नि) पाएंगे।
आचार्य श्री विद्यासागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी
याचना –> शब्द ज्यादा, भाव कम।
प्रार्थना –> शब्द कम, भाव ज्यादा।
(धनजी भाई – भोपाल)
वर्तमान के क्रियाकलाप मेरे व्यक्तित्व का सही से निर्धारण नहीं कर सकते।
मैं क्या नहीं कर पा रहा हूँ, वह सही निर्धारण करेगा।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
त्याग से ही व्यक्ति बड़ा/ महान बनता है, भोग से नहीं (नीचे ही जाता है)।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
व्यक्तियों से जुड़ोगे तो मोह।
गुणों से जुड़ोगे तो धर्म।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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