गुरु कोई व्यक्ति नहीं शक्ति हैं। जो हमको कभी नज़रों से, कभी आशीर्वाद से और कभी भावनाओं से बिना कहे/ बिना कुछ करे शक्ति देते रहते हैं।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण।
ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

जीना और जाना तो निश्चित है।
कैसे जाना/ क्या करके जाना ताकि आगे का जीवन अच्छे से जी सकें, यह हमारे हाथ में है।
चिनाई में पुरानी ईंटें, नई ईंटों की दिशा और दशा निर्धारित करती हैं।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

पुण्य जल है, पाप मल है।
ऐसे पुण्य का अर्जन करो जो पाप को धो दे।
ऐसे पुण्य का अर्जन, पवित्र परिणामों से होता है।
(ऐसा आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे-)

आचार्य श्री समयसागर जी

साँस ही जीवन है। जितनी अधिक साँस व्यय करेंगे उतना जीवन नष्ट होगा।
यदि प्राणायाम नहीं कर सकते तो लम्बी-लम्बी गहरी साँस लें।

निर्यापक मुनि श्री नियमसागर जी</span

राग से निवृत्ति के लिये… वानप्रस्थ आश्रम।
द्वेष से निवृत्ति के लिये… वृद्धाश्रम।
(वहाँ अपने को बनाये रखने के लिये द्वेष को कम करते करते समाप्त करना होता है)।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

सत्य प्रकट करने की अगर ज़िद ही है तो अपना सत्य प्रकट करें,
तुम्हारा तुरंत लाभ, देखने वाले प्रभावित होंगे और वे भी प्रेरित होंगे अपना सत्य प्रकट करने के लिए।

मुनि श्री जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी सुनाते थे…
क्या हो गया समझ में, मुझको न आता,
क्यों बार-बार मन बाहर दौड़ जाता।
स्वाध्याय ध्यान करके मन रोध पाता,
पै श्वान सा मन सदा मल शोध लाता।

आचार्य श्री समयसागर जी

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