मुसीबतें नसैनी के टूटे डंडे जैसी होती हैं ।
जो Extra पुरुषार्थ करके चढ़ते हैं, वे जल्दी मंज़िल पर पहुँचते हैं तथा भविष्य के लिये आदत भी पड़ जाती है ।

चिंतन

नसीहत प्राय: अच्छी नहीं लगती क्योंकि उसमें कुछ छोड़ना होता है, जबकि वसीयत में मिलता है ।
जिन्होनें नसीहत सही से ली हो उन्हें वसीयत का आकर्षण नहीं रहता ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

पूजा 3 प्रकार की (हर दर्शन में)…
1) आराध्य की…संकल्प सहित, अर्घ स्वाहा करके आराध्य के गुणों को लेन के भाव से ।
2) विशिष्ट अतिथि की…संकल्प/अर्घ/लेने के भाव बिना, सिर्फ देना ।
3) सांसारिक वस्तुओं की …मंगल/ शुभ भाव से, न लेना न देना।
● भरत चक्रवर्ती ने भगवान (समवसरण में) की पूजा करके, बचे तंदुलों को चक्र पर क्षेपण करके तीसरी प्रकार की पूजा की थी ।

मुनि श्री सुधा सागर जी

बारूद को देखना भी अशुभ/ अपशगुन है ।
इसीलिए भारतीय-संकृति में स्वागत पुष्पवृष्टि से होता था,
बंदूक/ तोप चलाकर नहीं (यह तो पाश्चात्य सभ्यता है)

मुनि श्री सुधा सागर जी

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

September 2026
M T W T F S S
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930