कौन किसके पीछे भागता है?
घर वालों के पीछे पाप या पाप के पीछे घर वाले?
बड़े तो पाप के पीछे ही भागते हैं इसलिये पाप छोटों के पीछे भागता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

यदि धर्म पुस्तकों पर बहुत दिनों तक दिमाग(Dimag) न लगाया जाए तो, उन पर दीमग(Demag)(दीमक) लग जाती है। दीमग(दीमक) का स्वभाव होता है कि वह बिना बुलाए घुस आती है, ऐसे ही बुराइयाँ हमारे जीवन में बिना बुलाए घुस आती हैं।
इसलिए समय-समय पर हमको अपनी कृतों पर तथा कृतियाँ(धर्म पुस्तकों) का निरीक्षण करते रहना चाहिए।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 सितम्बर)

चारों कषायें इंटरचेंजेबल हैं। मान की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध आ जाता है, क्रोध से सफलता नहीं मिलती तो मायाचारी करने का लोभ आता है।
कषायों को संभालना वैसे ही है जैसे मेंढकों को तराजू पर तौलना।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – अगस्त 31)

बनता*
चुपचाप है,
टूटता
आवाज़ के साथ है।
इस संसार में
आवाज़ ही
आवाज़ है।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

* निर्माण।

मनुष्यों की श्रेणियाँ…

  • कंजूस – मेरा 1 रुपया खर्च न हो, दूसरे के चाहे हज़ारों।
  • संतुलित – मैं भी खर्च करूँ, दूसरे को भी करने दूँ।
  • असंतुलित – मैं ही खर्च करूँ, दूसरे को खर्च न करने दूँ।

चिंतन

जैन साधु की पहचान, पदयात्री तथा करपात्री।

  • पदयात्री – जीवनपर्यन्त पैदल चलते हैं।
  • करपात्री – जीवनपर्यन्त हाथ में भोजन करना/ बर्तनों में नहीं।

मुनि श्री अजितसागर जी

नारियल को “श्रीफल” इसके अनेक गुणों के कारण कहते हैं। अन्य फलों से इसमें एक और विशेषता होती है कि यह रस अलग से बनाता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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