हम इतना समझाते हैं पर कोई भी समझता क्यों नहीं ?
चोर चोर की समझता नहीं है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
बड़ों की आशिका अपनी ओर लें, ताकि उनके गुण/ज्योति हममें भी आयें,
छोटों (दुल्हे आदि) की अपनी ओर से उनकी ओर करते हैं, ताकि हमारी ऊर्जा उनको मिले ।
मुनि श्री सुधासागर जी
मकान के खंभे में लोहे की छ्ड़ें अकेले सीधी खड़ी भी नहीं रह पातीं, पर सीमेंट के साथ ऊँची ऊँची मंज़िलों को बना देती हैं ।
चिंतन
समाजसेवा क्यों करें ?
समाज की वज़ह से ही हम असमाजिक तत्व बनने से बचे हुये हैं, इसीलिये समाज की सेवा करें ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
पेड़ में मनुष्य के आकार की कल्पना करके उससे उपकार की अपेक्षा, भ्रम टूटने के साथ समाप्त हो जाती है ।
ऐसे ही आत्मज्ञान हो जाने पर संसारी लोगों से उपकार की अपेक्षा भी समाप्त हो जाती है ।
समाधितंत्र गाथा – 22
अज्ञानी का आकर्षण नवीन और विविधता की ओर होता है,
इसीलिये उनमें अस्थिरता रहती है ।
ज्ञानी का पुरातन और स्थाईत्व की ओर रहता है ।
चिंतन
आपको किन्ही दो के बीच में राग दिख रहा है तो मानना आपको द्वेष है,
और यदि द्वेष दिख रहा है तो आपका राग छिपा है ।
रागद्वेष से ऊपर उठना विरक्ति है ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
जीवन
जो शेष है,
बस वही विशेष है ।
(सुरेश)
संसार में मन की बात ज़ुबान पर ना आने देना, ज़ुबान की बात/शरीर पर ना आने देना,
तथा धर्म में मन से वचन, वचन से शरीर की क्रियाओं में लाना ही, साधना है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
जिसने घर से पैर निकाल लिया, उसका घर घरोंदा बन गया ।
वही उस घर को लात मार सकता है । *
आचार्य श्री विद्यासागर जी
* बच्चे अपने-अपने पैरों के ऊपर बड़ी महनत से रेत के घरोंदे बनाते हैं,
पर माँ के बुलाने पर झट से पैर बाहर कर, अपने प्रिय घर को लात मारकर हंसते हुए चले जाते हैं ।
रावण 8 घंटे पूजादि करता था,
पर बाकि 16 घंटे भगवान के बताये मार्ग से विपरीत आचरण करता था,
इसलिये दुर्गति पायी ।
मुनि श्री सुधासागर जी
खिले फूलों को देख खुश मत हो जाना,
विकास की सार्थकता तो पराग पर से अंदर की पंखुड़ियाँ हटाना है/खुशबू बिखेरना है ,
संस्कारों की संतति बढ़ाना है।
आ.श्री के प्रवचनों पर आधारित चिंतन
दुर्घटनायें मोड़ों पर कम, सीधी सड़कों पर अधिक होती हैं ।
काँटे वहाँ ज्यादा लगते हैं जहाँ फूल बिछे होते हैं ।
दु:ख सुखों के कारणों से अधिक मिलते हैं जैसे गुटखा !
मुनि श्री सुधासागर जी
मरणकाल में रुचिकर धार्मिक-क्रियाओं का ही स्मरण करायें ।
संसारी चीज़ों से वैराग्य करायें ।
यदि स्वाध्यायी हों तो ही आत्मबोध दें ।
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