बच्चों को याद करायें –
1. पाप से भय
2. संवेदनशीलता
3. धर्म कुल का गौरव

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

घर के मुखिया की हालत उस टिन के शैड जैसी होती है जो बारिश, तूफान, ओलावृष्टि सब झेलता है, लेकिन उसके नीचे वाले कहते हैं कि यह शोर बड़ा करता है और गरम भी जल्दी हो जाता है।

(डॉ.पी.एन.जैन)

पाप से भी बड़ा पाप है – “पाप को स्वीकार ना करना” ।
स्वीकार करते ही वह प्रायश्चित बन जाता है, तप कहलाता है ।
अंजन चोर भी निरंजन बन जाता है ।

पुण्य से भी बड़ा पुण्य है – “अपने आप को पापी कहना” ।

मुनि श्री सुधासागर जी

थकावट तब आती है जब फुरसत होती है ।
लगातार परिश्रम करते समय तो थकावट पसीने में निकलती रहती है, चेहरे पर चमक आ जाती है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

नारी नदी है, फसल पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाती है ।
लेकिन जब वासना की बाढ़ आ जाय तो उसी फसल को बर्बाद भी कर देती है ।
सारा कूड़ाकरकट अपने में समेट लेती है ।

हम बड़े हो रहे हैं या छोटे ?
उम्र घट रही है तो हम सावधान क्यों नहीं हो रहे हैं ??
स्टेशन पास आ रहा है तो सो क्यों रहे हैं ?
सामान समेटना क्यों नहीं शुरू कर रहे ??

जिस देह में समृद्ध आत्मा हो, उस देह को देवालय कहा है, दिवालिया देह को नहीं ।
आत्मा का दर्शन करना है तो दर्पण पर से धूल हटानी होगी, तभी वास्तविक स्वरूप दिख पायेगा ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

तालियाँ सुनने का भाव आये तो सोचना – उनको कैसा लगता होगा जिनको तालियाँ नहीं मिलतीं ।
दोनों हाथों से पुरुषार्थ करो तो दोनों हाथों से तालियाँ स्वत: ही बजेंगी ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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