मीठा मीठा सुनोगे तो सुगर बढ़ जायेगी,
करेला/मिर्ची खाओगे तो घट जायेगी (विष से ही विष कटता है) ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

पाप परिस्थिति नहीं कराती, मन:स्थिति कराती है ।
जिस परिस्थिति में रागी पाप करता है, उसी परिस्थिति में वैरागी पुण्य करता है ।

क्षु. श्री ध्यानसागर जी

एक तरफ भगवान के दर्शन हों, दूसरी ओर चींटी की रक्षा तो पहले चींटी की ओर देखो ।
चींटी की ओर देखोगे तो भगवान बनोगे,
भगवान की ओर देखोगे तो (यदि चींटी मर गयी तो !) चींटी बनोगे ।

मुनि श्री सुधासागर जी

नवनीत मथने पर ऊपर आ जाता है, पर पूरा नहीं;
घी तपने पर पूरा उठ जाता है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

सफलता किसी पर आश्रित नहीं होती – पैसा, प्रसिद्धि आदि पर नहीं।
गुणों को निखारना/उन्हें बनाये रखना सफलता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सीताजी ने अपने सतीत्व का हवाला देकर अग्नि परीक्षा में अग्नि को शांत कर दिया, पर जब रावण उनके सतित्व को खंड़न करने के लिये ले जा रहा था तब सतीत्व का सहारा क्यों नहीं लिया ?
जब भी कोई मर्यादा खंड़ित कर देता है तब दोष लग जाता है, चाहे वह उल्लंघन परोपकार के लिये ही क्यों ना हो ।

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