चादर से पैर
तभी बाहर आते हैं,
जब
“असूलों” से बड़े
“ख़्वाब” हो जाते हैं ।

(ललित)

हमारी प्रगति क्यों नहीं हो रही ?
हममें अवगुण ही नहीं, गुण भी एक से एक अच्छे हैं/पूर्व में रहे भी हैं;
पर हम उनकी सुरक्षा नहीं कर पाए/उन्हें बढ़ा नहीं पाए ।
इसी लिए जहाँ थे, वहाँ से नीचे चले जा रहें हैं;
क्योंकि किसी भी स्थिति में रुके नहीं रह सकते ।

मिट्टी की मूर्तियाँ बनाने वाला कलाकार ईश्वर से कहता है….. 

हे प्रभु ! तू भी एक कलाकार है और मैं भी एक कलाकार हूँ,
तूने मुझ जैसे असंख्य बुत बनाकर इस धरती पर भेजे हैं,
और मैंने तेरे असंख्य बुत बना कर इस घरती पर बेचे हैं ।
पर ईश्वर उस समय बड़ी शर्म आती है, जब तेरे बनाए हुए बुत आपस में लड़ते हैं,
और मेरे बनाये हुए बुतों के सामने लोग शीश झुकाते हैं ।

(मंजु)

भक्त बार बार जन्म माँगता है;
ज्ञानी बार बार जन्म ना मिले, ऐसी भावना भाता है;
चारित्रधारी कुछ भी नहीं माँगता,
पर उसे बिना माँगे मोक्ष प्राप्त हो जाता है ।

चिंतन

समय बहाकर ले जाता है…
नाम और निशान,
कोई “हम” में रह जाता है,
कोई “अहम्” में ।

बोल मीठे ना हों तो हिचकियाँ भी नहीं आतीं,
घर बड़ा हो या छोटा,
अगर मिठास ना हो तो इनसान तो क्या,
चीटीयाँ भी नहीं आतीं ।

(शैलेन्द्र जैन)

छोटी उँगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठाने वाले, श्री कृष्ण, बाँसुरी दोनों हाथों से बजाते थे ।

बस इतना ही अंतर है, पराक्रम और प्रेम में..
प्रेम में पराक्रम ज़्यादा लगता है ।

(मंजु)

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