रस्सी आदि से बंधे हों तो, तोड़ने की कोशिश करते हैं,
पर अद्रश्य बंधनों (मोहादि) को तोड़ने की कोशिश ही नहीं करते ।

चिंतन

व्यथा में सुख की नहीं, शान्ति की तलाश रहती है ।
सुख की खोज तो अंतहीन है (जैसे ही व्यथा समाप्त हुई, फिर से सुख की खोज में लग जाते हैं) ।

क्षु. श्री ध्यानसागर जी

किसी की अंतिम यात्रा में जाओ तो यह मत समझना कि आप उसे उसकी मंज़िल पर ले जा रहे हैं…
बल्कि ,
यह समझना कि अर्थी पर लेटा इंसान…
मुर्दा होकर भी तुम्हें तुम्हारी मंज़िल दिखाने ले जा रहा है ।

(मंजू)

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

November 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
30