संस्थाऐं भी शरीर की तरह बूढ़ी होती रहतीं हैं ।
समाधान है-
परिवर्तन,
तब ये हमेशा युवा रह सकतीं हैं ।
गृहस्थ का खाली मन शैतान का,
साधु का खाली मन भगवान का ।
जो आत्मा में रमे सो “राम”,
और जो विषयों में रमे सो “हराम” ।
एक मटका और गुलदस्ता साथ में खरीदा हो और घर में लाने के 3 दिन बाद 50 रुपये का मटका अगर फूट जाए तो हमें इस दुःख होता है, क्योंकि मटका इतनी जल्दी फूट जायेगा ऐसी हमें कल्पना भी नहीं थी,
पर गुलदस्ते के फूल जो 200 रुपये के थे, वो शाम तक मुरझा जाँए तो भी हम दुःखी नहीं होते, क्योंकि ऐसा होने वाला ही है, यह हमें पता ही था ।
जिससे जितनी अपेक्षा ज़्यादा,
उसकी तरफ से उतना दुःख ज़्यादा ।
(अरविंद)
(प्रियजनों के विछोह पर भी दुःख इसीलिये होता है क्योंकि हम उनसे विछोह की अपेक्षा नहीं रखते)।
कड़वी गोलियाँ चबाई नहीं, निगली जाती हैं ।
उसी प्रकार जीवन में अपमान,असफलता ,धोखे जैसी कड़वी बातों को सीधे गिटक जाऐं…
उन्हें चबाते रहेंगे यानि याद करते रहेंगे तो जीवन कड़वा ही रह जाएगा ।
(सुरेश)
स्वार्थ + पर पीड़ा = पाप ।
नज़ारे नज़र नहीं दिखाती बल्कि नज़रिया दिखाता है ।
नज़रिया को ही सच्चा/झूठा दर्शन कहा है ।
क्षु. ध्यान सागर जी
जो कभी “काम-ना” आये ।
(याने काम की पूर्णता ना हो पाये) ।
चिंतन
एक शिष्य ने अपने गुरूजी से पूछा – ” नष्ट होने वाले इस शरीर में, नष्ट ना होने वाली आत्मा कैसे रहती है ? ”
गुरूजी का कहा :- वत्स ! जिस तरह दूध उपयोगी तो है किन्तु एक ही दिन के लिए,
फिर वह बिगड़ जाता है ।
दूध में एक बूंद छाछ की डालने से वह दही बन जाता है,
जो फिर एक और दिन टिकता है ।
दही का मथने से उसका मक्खन बन जाता है,
यह भी एक और दिन टिकता है ।
मक्खन को उबालने से घी बनता है,
और घी कभी भी नहीं बिगड़ता है ।
जिस तरह से एक दिन में बिगड़ने वाले दूध में कभी ना बिगड़ने वाला घी छिपा होता है ।
इसी तरह से अशाश्वत शरीर में शाश्वत आत्मा रहती है ।
मानव शरीर, दूध समान
दैवीय स्मरण, छाछ समान
सेवा भाव, मक्खन समान
तथा
साधना करना घी समान होता है ।
मानव शरीर को साधना से पिघलाने पर आत्मा पवित्रता प्राप्त करती है ।
(अभिषेक-देहली)
एक दिशा में चार रिश्तेदार, चार कदम तब ही चलते हैं ,
जब पांचवा कंधे पर हो…
(नीलांजना)
एक बार समुद्री तूफ़ान के बाद लाखों मछलियाँ किनारे पर तड़प तड़प कर मर रहीँ थीं ! एक बच्चे से रहा नहीं गया,
और वह एक एक मछली उठा कर समुद्र में वापस फेंकने लगा !
यह देख कर उसकी माँ बोली…
बेटा लाखों की संख्या में हैं, तू कितनों की जान बचाएगा, रहने दे कोई फ़र्क नहीं पड़ता !
बच्चे ने एक और मछली को समुद्र में फेंकते हुए कहा… माँ इसको तो फ़र्क पड़ता है न ?
लोगों को हमेशा हौसला और उम्मीद देने की कोशिश करें, न जानें कब आपकी वजह से किसी की ज़िंदगी बदल जाए !
क्योंकि आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता,
पर,
“उसको तो फ़र्क पड़ता है” ।
(रजनी)
फिर उड़ गयी नींद ये सोच कर,,,
सरहद पर बहा वो खून मेरी नींद के लिये था…!
2) उम्र जन्नत में रह कर, उसे उजाड़ने में गुज़ार दी,
और जिहाद बस इस बात की थी, कि मरने के बाद जन्नत मिले…
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