एक बार समुद्री तूफ़ान के बाद लाखों मछलियाँ किनारे पर तड़प तड़प कर मर रहीँ थीं ! एक बच्चे से रहा नहीं गया,
और वह एक एक मछली उठा कर समुद्र में वापस फेंकने लगा !
यह देख कर उसकी माँ बोली…
बेटा लाखों की संख्या में हैं, तू कितनों की जान बचाएगा, रहने दे कोई फ़र्क नहीं पड़ता !
बच्चे ने एक और मछली को समुद्र में फेंकते हुए कहा… माँ इसको तो फ़र्क पड़ता है न ?

लोगों को हमेशा हौसला और उम्मीद देने की कोशिश करें, न जानें कब आपकी वजह से किसी की ज़िंदगी बदल जाए !
क्योंकि आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता,
पर,
“उसको तो फ़र्क पड़ता है”  ।

(रजनी)

फिर उड़ गयी नींद ये सोच कर,,,
सरहद पर बहा वो खून मेरी नींद के लिये था…!

2) उम्र जन्नत में रह कर, उसे उजाड़ने में गुज़ार दी,
और जिहाद बस इस बात की थी, कि मरने के बाद जन्नत मिले…

हरिवंशराय बच्चन जी की एक ख़ूबसूरत कविता,

“रब” ने नवाज़ा हमें ज़िंदगी देकर,
और हम “शौहरत” माँगते रह गये ।
ज़िंदगी गुज़ार दी शौहरत के पीछे,
फिर जीने की “मोहलत” माँगते रह गये ।।

2) ये समुंदर भी दुनिया की तरह खुदगर्ज़ निकला,
ज़िंदा थे तो तैरने न दिया मर गए तो डूबने न दिया

3) जो सामने है उसे लोग बुरा कहते हैं,
जिसको देखा नहीं उसे सब “ख़ुदा” कहते हैं ।

(सुरेश)

भगवान, गुरु, शास्त्रों से;
माँ और बड़ों से, उनके बताये हुए मार्ग पर न चल पाने के लिये;
अपने आप से, जीवन सही तरीके से न जी पाने के लिये;
संसार के सब जीवों से, जाने/अनजाने में हुई ग़लतीयों के लिये;
क्षमा भाव ।

2) रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार,
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार ।

(ब्र.निलेश भय्या)

3) दिल में बसी नफ़रत को मिटा देना भी,
एक स्वच्छता अभियान है ।

(आर.के.गुप्ता)

आत्मा में रमना ही सच्चा ब्रम्हचर्य है ।

प्रवचन पर्व (आ.श्री विद्या सा.जी)

2) बेटे और पति के शरीरों पर हाथ रखने से जब एकसा महसूस हो तब पूर्ण ब्रम्हचर्य मानें ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमा सा.जी

“यह मेरा है”
ऐसे भाव का त्याग करना ही आकिंचन्य धर्म है ।

2) मछली पानी के बाहर आने पर मरने का एक कारण आक्सीजन की अत्यधिक मात्रा भी होती है, मनुष्य भी शुध्द आक्सीजन नहीं ले सकता ।

वैभव की अधिकता भी हमारे लिये ऐसा ही कारण बन जाती है ।

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