इच्छा का निरोध ही तप है ।
या
अपेक्षा निरोध: तप: ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

मन,वचन,काय का सदुपयोग ही संयम है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

2) एक बड़ा ही शरारती बच्चा था। उसे दिन-भर खेलना , टी वी देखना और बढ़िया खाना, पीना ही पसंद था । उसकी माँ उसे बहुत समझाती, पर वह कभी न सुनता।
एक बार उनके घर के सामने से एक पुलिस अधिकारी एक कैदी को लेकर निकला। दोनों के साथ 5-5 सैनिक चल रहे थे, लेकिन जहाँ पुलिस अधिकारी के पांचों सैनिक उसके पीछे चल रहे थे और उसके सभी आदेशों का पालन कर रहे थे, वहीं कैदी को उन पाँचों सैनिकों के पीछे चलना पड़ रहा था और उनके आदेशों का पालन करना पड़ रहा था।
माँ ने बेटे को यह सब दिखाकर पूछा – बताओ , तुम इन दोनों में से क्या बनना चाहते हो ! पुलिस अधिकारी या कैदी ?
बेटे ने कहा- बेशक, मैं पुलिस अधिकारी बनना चाहुँगा।
तब माँ ने उसे समझाते हुए कहा-फिर तो तुम्हें अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण करना पड़ेगा , तभी तो ये तुम्हारी बात मानेंगी , तुम्हारे पीछे चलेंगी और यदि तुमने इन्हें नियंत्रण करना नहीं सीखा तो तुम्हें इनकी बात माननी पड़ेगी , इनके पीछे दौड़ना पड़ेगा और तब तुम अपने मन और इन्द्रियों के कैदी मात्र बनकर रह जाओगे।

कहते हैं “सत्य कड़वा होता है”,
पर वास्तविकता यह है कि सत्य कड़वा हो ही नहीं सकता ।
यदि कड़वा होता तो भगवान तो सदैव असत्य-वचन ही बोलते क्योंकि भगवान कभी कड़वे वचन बोल ही नहीं सकते और उन्होंने तो सत्य के अलावा कुछ बोला ही नहीं !
सचाई यह है कि हम सत्य को कलुषता के लिफाफे में रख कर pass-on करते हैं ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

पवित्रता,
जो लोभ के अभाव में/संतोष से आती है,
और
शरीर की पवित्रता, गुणों से/तप से आती है ।

2) एक कंजूस सेठ गड्ढ़े में गिर गया । लोग उसे ऊपर खींचने के लिये, उसका हाथ माँग रहे थे पर वह हाथ नहीं दे रहा था, बस “बाहर निकालो” की रट लगाये जा रहा था ।
उसको जानने वाला एक व्यत्ति आया, उसने सेठ से हाथ माँगा तो सेठ ने तुरंत हाथ दे दिया और सेठ को बाहर खींच लिया गया ।

जिसने कभी किसी को कुछ भी न दिआ हो,
वह अपनी जान बचाने के लिये भी अपना हाथ भी नहीं दे सकता ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

मायाचारी का अभाव ।

2) ईमानदारी, उन्मुत्त हृदय, स्पष्टवादिता, सादगी, भोलापन, सरलता ही आर्जव धर्म है ।

ईमानदारी की नाव पर तो हम सब सवारी कर रहे हैं पर उसमें बेईमानी के अनेकों छेद हैं,
जिन्हें सफेद/स्वच्छ कपड़े से ढके रहते हैं ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

3) जोकर तो एक मुखौटा पहनता है,
जो सबको दिखता है,
पर हम तो अनेकों मुखौटे पहनते हैं और किसी को दिखने भी नहीं देते ।

4) दोहरा जीवन जीने वाले, दोहरे stress में रहते हैं ।

“म”  से मान का
“द” से दमन,
“व” से विनम्रता द्वारा ।

2) मार्दव धर्म का प्रारम्भ होगा…
भगवान के सम्मान / गुणगान से,
फिर गुरु / शास्त्र तथा माता पिता के से,
इनके प्रति कृतज्ञता का भाव बनाये रखने से ।
और अंत में छोटों को सम्मान देने से ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

3) मान त्रिकोणा घेरा है जो तीनों से मिलने नहीं देता…
* भगवान से
* संसार से
* अपने आप से भी ।

4) आसमां पे ठिकाने किसी के नहीं होते,
जो जमीं के नहीं होते वो कहीं के नहीं होते..

5) झूठी शान के परिंदे ही ज्यादा फड़फड़ाते हैं …
बाज़ की उड़ान में कभी आवाज़ नहीं होती ।

 

1) क्रोध आने के कारण…
* मनोवृत्ति
* आसक्ति
* अपेक्षा

गुरवर श्री क्षमासागर जी

2) क्रोध पर क्रोध करने से क्रोध कम नहीं होगा,
क्षमा रूपी दीपक के प्रकाश में क्रोध का अंधकार पास नहीं आ पायेगा ।

पूरी जिंदगी हम इसी बात में गुजार देते हैं कि……. “चार लोग क्या कहेंगे”,
और अंत में चार लोग बस यही कहते हैं कि…. “अरिहंत नाम सत्य है / राम नाम सत्य है” ।

(नीलांजना)

“बुराई ” करना रोमिंग की तरह है,
बोलो तो भी चार्ज लगता है और सुनो तो
भी ।

“नेकी” करना LIC की तरह है,
ज़िंदगी के साथ भी,
ज़िंदगी के बाद भी ।

तो “धर्म” की प्रीमियम भरते रहो
और अच्छे कर्म का “बोनस” पाते रहो……।

(अपूर्व श्री)

पराश्रित सुख से उत्तम स्वाश्रित दुःख है,
तभी तो साधु विषय-सुखों का त्याग करके तप के दुःख को अंगीकार करके सुखी रहते हैं।

क्षु.श्री ध्यान सा.जी

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